
नई दिल्ली/सिडनी। भारतीय हॉकी के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय आज समाप्त हो गया। भारतीय पुरुष हॉकी टीम के पूर्व मुख्य कोच और ऑस्ट्रेलियाई दिग्गज माइकल नोब्स का 72 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। उनके परिवार की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, नोब्स पिछले लंबे समय से एक गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे और उन्होंने अपने गृहनगर में अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर फैलते ही वैश्विक हॉकी बिरादरी और विशेषकर भारत के हॉकी प्रेमियों में शोक की लहर दौड़ गई है।
भारतीय हॉकी में नोब्स का कार्यकाल: चुनौतियों और उपलब्धियों का सफर
माइकल नोब्स को जून 2011 में भारतीय पुरुष हॉकी टीम का मुख्य कोच नियुक्त किया गया था। वह ऐसे समय में भारत आए थे जब भारतीय हॉकी अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही थी—टीम 2008 के बीजिंग ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने में विफल रही थी, जो भारतीय हॉकी के इतिहास का सबसे निचला स्तर माना जाता था।
नोब्स की सबसे बड़ी उपलब्धि 2012 के लंदन ओलंपिक के लिए भारतीय टीम को क्वालीफाई कराना थी। उनके मार्गदर्शन में भारत ने दिल्ली में आयोजित क्वालीफायर टूर्नामेंट के फाइनल में फ्रांस को 8-1 से करारी शिकस्त देकर ओलंपिक में अपनी जगह पक्की की थी। हालांकि लंदन ओलंपिक में टीम का प्रदर्शन उम्मीदों के मुताबिक नहीं रहा और भारत अंतिम स्थान पर रहा, लेकिन नोब्स ने टीम में ‘आक्रामक और तेज’ (Attacking Hockey) शैली को फिर से जीवित किया था, जिसके लिए भारतीय हॉकी जानी जाती थी।
कोच नहीं, एक मार्गदर्शक की भूमिका
माइकल नोब्स केवल एक कोच नहीं थे, बल्कि वे भारतीय खिलाड़ियों के बीच काफी लोकप्रिय थे। उन्होंने आधुनिक फिटनेस मानकों और वैज्ञानिक प्रशिक्षण विधियों को भारतीय शिविर में पेश किया था। सरदार सिंह, संदीप सिंह और श्रीजेश जैसे दिग्गज खिलाड़ी उनके कार्यकाल के दौरान अपनी प्रतिभा के चरम पर पहुँचे थे।
नोब्स अक्सर कहते थे कि भारतीय हॉकी का डीएनए ‘हमला’ करना है, और उन्होंने इसी शैली को बढ़ावा देने के लिए अपना पूरा जोर लगा दिया। 2013 में खराब स्वास्थ्य और कुछ अन्य कारणों से उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था, लेकिन भारत के प्रति उनका लगाव कभी कम नहीं हुआ।
खेल जगत और हॉकी इंडिया की श्रद्धांजलि
हॉकी इंडिया ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा, “माइकल नोब्स का भारतीय हॉकी में योगदान अविस्मरणीय है। उन्होंने उस समय टीम की बागडोर संभाली जब हमें एक मजबूत नेतृत्व की आवश्यकता थी। उनके मार्गदर्शन में हमने फिर से ओलंपिक मंच पर कदम रखा।”
पूर्व कप्तान सरदार सिंह ने उन्हें याद करते हुए कहा, “नोब्स सर एक बेहतरीन इंसान और कोच थे। उन्होंने हमें निडर होकर खेलना सिखाया। हॉकी जगत ने आज अपना एक सच्चा हितैषी खो दिया है।”
निष्कर्ष
माइकल नोब्स भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन भारतीय हॉकी को फिर से वैश्विक मानचित्र पर लाने के लिए किए गए उनके शुरुआती प्रयास हमेशा याद रखे जाएंगे। उनके निधन से एक ऐसी रिक्तता पैदा हुई है जिसे भरना कठिन है। खेल जगत उन्हें एक ऐसे योद्धा के रूप में याद रखेगा जिसने अंतिम समय तक हार नहीं मानी।