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भारतीय एथलेटिक्स में बड़ा बदलाव: AFI ने लागू किए कड़े नियम, अब गायब रहकर चयन पाना होगा नामुमकिन

नई दिल्ली। भारतीय एथलेटिक्स के इतिहास में पारदर्शिता और प्रदर्शन की निरंतरता को बढ़ावा देने के लिए एथलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (AFI) ने एक क्रांतिकारी और कड़ा फैसला लिया है। महासंघ ने स्पष्ट कर दिया है कि अब केवल बड़े टूर्नामेंटों या मुख्य ट्रायल के समय उभरने वाले ‘सीजनल एथलीटों’ के दिन लद गए हैं। नए नियमों के अनुसार, किसी भी एथलीट को राष्ट्रीय टीम में चयन या मुख्य ट्रायल (जैसे इंटर-स्टेट मीट) में भाग लेने के लिए साल भर सक्रिय रहना होगा।

क्या है नया नियम? 3 प्रतियोगिताओं की अनिवार्यता

AFI के नवीनतम निर्देश के अनुसार, अब किसी भी एथलीट को ‘इंटर-स्टेट मीट’ (जो आगामी एशियाई खेलों और अन्य अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं के लिए अंतिम चयन ट्रायल माना जाता है) में प्रवेश पाने के लिए साल में कम से कम तीन राष्ट्रीय या मान्यता प्राप्त प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना अनिवार्य होगा।

इसका सीधा अर्थ यह है कि यदि कोई खिलाड़ी साल भर चोट या व्यक्तिगत प्रशिक्षण का बहाना बनाकर घरेलू सर्किट से बाहर रहता है और सीधे मुख्य ट्रायल में अपनी जगह बनाना चाहता है, तो उसे अब अनुमति नहीं दी जाएगी।

नियम के पीछे का मुख्य उद्देश्य: डोपिंग पर प्रहार

इस कड़े कदम के पीछे सबसे बड़ा कारण डोपिंग (Doping) की बढ़ती समस्या है। AFI की जांच में यह सामने आया था कि कई एथलीट साल के अधिकांश समय डोपिंग रोधी एजेंसियों (NADA/WADA) की नजरों से बचने के लिए अज्ञात स्थानों पर प्रशिक्षण लेते हैं और केवल मुख्य चयन ट्रायल के दौरान ही मैदान पर नजर आते हैं।

“हमें एथलीटों की निरंतरता और उनकी स्वच्छता (Clean Sports) सुनिश्चित करनी है। साल भर प्रतिस्पर्धा में रहने से एथलीट लगातार जांच के दायरे में रहेंगे, जिससे प्रतिबंधित दवाओं के सेवन की गुंजाइश कम होगी।” – AFI आधिकारिक बयान

निरंतरता और प्रतिस्पर्धात्मक स्तर को सुधारना

AFI का मानना है कि भारतीय एथलीटों को वैश्विक स्तर पर पदक जीतने के लिए साल भर उच्च स्तरीय प्रतिस्पर्धा में रहने की आवश्यकता है। अक्सर देखा गया है कि एथलीट केवल एक बड़े इवेंट को लक्ष्य बनाते हैं और बाकी समय उनकी फिटनेस और प्रदर्शन का ग्राफ गिर जाता है।

  • नियमित निगरानी: साल में कम से कम तीन स्पर्धाओं में भाग लेने से कोचों और चयनकर्ताओं को एथलीट की प्रगति का सटीक डेटा मिलता रहेगा।

  • युवा प्रतिभाओं को मौका: इस नियम से उन युवा खिलाड़ियों को फायदा होगा जो साल भर मेहनत करते हैं और हर छोटी-बड़ी प्रतियोगिता में हिस्सा लेते हैं।

गायब रहने वाले एथलीटों पर शिकंजा

अतीत में कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जहाँ बड़े नामों वाले एथलीटों ने राष्ट्रीय चैंपियनशिप और फेडरेशन कप जैसे महत्वपूर्ण आयोजनों को नजरअंदाज किया। अब नए नियम के लागू होने से ऐसे एथलीटों की मनमानी पर लगाम लगेगी। यदि कोई एथलीट चोटिल है, तो उसे मेडिकल बोर्ड के सामने अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी और रिहैबिलिटेशन (Rehabilitation) की प्रक्रिया से गुजरना होगा, न कि बिना जानकारी के गायब रहना होगा।

एशियाई खेलों के चयन पर असर

चूंकि 2026 में एशियाई खेलों (Asian Games) का आयोजन होना है, इसलिए यह नियम और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। इंटर-स्टेट मीट को हमेशा से ‘अंतिम द्वार’ माना जाता है, लेकिन अब इस द्वार तक पहुँचने के लिए एथलीटों को पिछले टूर्नामेंटों का ‘योग्यता प्रमाण-पत्र’ दिखाना होगा। यह सुनिश्चित करेगा कि भारतीय दल में केवल वही खिलाड़ी शामिल हों जो पूरी तरह फिट और फॉर्म में हैं।

खेल विशेषज्ञों की राय

खेल जगत के विशेषज्ञों ने AFI के इस फैसले का स्वागत किया है। उनका कहना है कि इससे भारतीय एथलेटिक्स में अनुशासन आएगा। हालांकि, कुछ का यह भी मानना है कि महासंघ को उन एथलीटों के लिए भी स्पष्ट गाइडलाइन बनानी चाहिए जो विदेश में प्रशिक्षण ले रहे हैं, ताकि उनकी भागीदारी को भी सही ढंग से मापा जा सके।

निष्कर्ष

भारतीय एथलेटिक्स महासंघ का यह फैसला खेल को स्वच्छ और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में एक साहसिक कदम है। 600 फीट की सड़क में भ्रष्टाचार पर कार्रवाई हो या खेल के मैदान पर डोपिंग के खिलाफ जंग—नियमों की सख्ती ही बेहतर भविष्य की नींव रखती है। अब भारतीय एथलीटों को ट्रैक पर अपनी काबिलियत साल भर साबित करनी होगी, तभी वे तिरंगे का मान अंतरराष्ट्रीय मंच पर बढ़ा पाएंगे।


मुख्य बिंदु:

  • नियम: साल में 3 प्रतियोगिताओं में भागीदारी अनिवार्य।

  • लक्ष्य: डोपिंग रोकना और प्रदर्शन में निरंतरता लाना।

  • प्रभाव: बिना पूर्व भागीदारी के ‘इंटर-स्टेट मीट’ में प्रवेश वर्जित।

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