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पार्किंसंस और अल्जाइमर पर विज्ञान की बड़ी जीत: ‘लीवर एंजाइम’ और ‘स्टेम सेल’ ने खोली उपचार की नई राहें

लंदन/न्यूयॉर्क। चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में आज का दिन (21 फरवरी, 2026) स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज किया जा सकता है। दशकों से लाइलाज मानी जाने वाली बीमारियां—पार्किंसंस (Parkinson’s) और अल्जाइमर (Alzheimer’s)—अब शायद पूरी तरह से ठीक हो सकेंगी। अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की एक टीम ने दो बड़े शोधों के जरिए यह साबित किया है कि शरीर के प्राकृतिक तंत्र और उन्नत सेल थेरेपी के मिलन से मस्तिष्क की गंभीर बीमारियों को मात दी जा सकती है।

1. लीवर से मस्तिष्क का सीधा संबंध: जीपीएलडी1 (GPLD1) एंजाइम की खोज

शोध का पहला और सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उस जादुई एंजाइम की पहचान है जो व्यायाम के दौरान हमारे लीवर (यकृत) से निकलता है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि जब हम शारीरिक व्यायाम करते हैं, तो लीवर GPLD1 नामक एक विशेष एंजाइम का उत्पादन शुरू कर देता है।

यह एंजाइम रक्त के माध्यम से मस्तिष्क तक पहुँचता है और ‘ब्लड-ब्रेन बैरियर’ (Blood-Brain Barrier) की मरम्मत में मदद करता है। गौरतलब है कि बढ़ती उम्र और अल्जाइमर जैसी बीमारियों में यह सुरक्षा दीवार कमजोर हो जाती है, जिससे हानिकारक तत्व मस्तिष्क में प्रवेश कर जाते हैं और याददाश्त को नुकसान पहुँचाते हैं।

वैज्ञानिकों ने पाया कि जिन बुजुर्गों में इस एंजाइम का स्तर अधिक था, उनकी याददाश्त और मानसिक कार्यक्षमता युवाओं के समान थी। यह खोज उन लोगों के लिए वरदान साबित हो सकती है जो शारीरिक अक्षमता के कारण व्यायाम नहीं कर सकते; भविष्य में इस एंजाइम को एक दवा या सप्लीमेंट के रूप में विकसित किया जा सकता है।

2. स्टेम सेल प्रत्यारोपण: पार्किंसंस का स्थायी समाधान?

दूसरा बड़ा धमाका एक क्लिनिकल ट्रायल के नतीजों ने किया है। पार्किंसंस रोग में मस्तिष्क की वे कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं जो डोपामाइन (शरीर की गतिविधियों को नियंत्रित करने वाला रसायन) बनाती हैं। इसके कारण मरीज के हाथ-पैर कांपने लगते हैं और वह चलने-फिरने में असमर्थ हो जाता है।

वैज्ञानिकों ने मरीजों के दिमाग के प्रभावित हिस्से में डोपामाइन बनाने वाली नई स्टेम कोशिकाएं सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित की हैं। ट्रायल के शुरुआती नतीजों में देखा गया है कि ये नई कोशिकाएं न केवल जीवित रहीं, बल्कि उन्होंने प्राकृतिक रूप से डोपामाइन का उत्पादन भी शुरू कर दिया है। इससे मरीजों के कंपन (Tremors) में 60% तक की कमी दर्ज की गई है।

यह खोज क्यों है खास?

  • दवाओं पर निर्भरता कम होगी: अभी तक इन बीमारियों के लिए जो दवाएं दी जाती हैं, वे केवल लक्षणों को दबाती हैं, बीमारी को जड़ से खत्म नहीं करतीं। यह नई तकनीक बीमारी को ‘रिवर्स’ (पलटने) की क्षमता रखती है।

  • प्राकृतिक उपचार की ओर कदम: लीवर एंजाइम की खोज यह बताती है कि हमारा शरीर खुद को ठीक करने में सक्षम है, बस उसे सही ट्रिगर की जरूरत है।

  • जीवन की गुणवत्ता: अल्जाइमर के मरीजों के लिए अपनी पहचान और अपनों को याद रखना अब मुमकिन हो सकेगा।

भविष्य की संभावनाएं

हालांकि ये परिणाम बहुत उत्साहजनक हैं, लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि इस तकनीक को आम जनता के लिए उपलब्ध होने में अभी कुछ और चरणों के परीक्षण की आवश्यकता है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगले 2 से 4 वर्षों में यह उपचार अस्पतालों में उपलब्ध हो सकता है।

प्रमुख शोधकर्ता का बयान: “हम अब उस मोड़ पर हैं जहाँ हम कह सकते हैं कि दिमागी बीमारियों का मतलब अब अंत नहीं है। लीवर और दिमाग के बीच का यह गुप्त रास्ता चिकित्सा विज्ञान का सबसे बड़ा रहस्योद्घाटन है।”

निष्कर्ष

21 फरवरी 2026 की यह रिपोर्ट हमें याद दिलाती है कि मानव मेधा किसी भी चुनौती को पार कर सकती है। यह केवल एक मेडिकल न्यूज़ नहीं है, बल्कि उन परिवारों के लिए एक आशा की किरण है जो अपनों को इन बीमारियों के कारण धीरे-धीरे खोते हुए देख रहे थे।

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