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RGHS घोटाला: श्रीगंगानगर में भ्रष्टाचार का नया केंद्र

जांच की शुरुआत एक बहुत ही चौंकाने वाले खुलासे से हुई। श्रीगंगानगर में कार्यरत एक सरकारी चिकित्सक के परिवार के सदस्यों के नाम पर लाखों रुपये की दवाइयों के बिल आरजीएचएस पोर्टल पर अपलोड किए गए। जांच दल को तब संदेह हुआ जब यह पाया गया कि परिवार के एक ही सदस्य के नाम पर ऐसी गंभीर बीमारियों की दवाइयां ली गईं, जिनका उनसे कोई संबंध ही नहीं था।

यह केवल एक डॉक्टर का मामला नहीं है, बल्कि एक बड़े नेक्सस की ओर इशारा करता है जिसमें सरकारी कर्मचारी, फार्मासिस्ट और कुछ निजी अस्पताल शामिल हैं। फर्जी प्रिस्क्रिप्शन तैयार किए गए और पोर्टल पर दवाइयों का वितरण दिखा दिया गया, जबकि वास्तविकता में दवाइयां किसी मरीज तक पहुँची ही नहीं।

2. ऑडिट टीम की रडार पर ‘दवा माफिया’

प्रदेश स्तर पर हड़कंप मचने के बाद, राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण (State Health Authority) ने विशेष ऑडिट टीमों का गठन किया है। श्रीगंगानगर में अब उन निजी अस्पतालों और मेडिकल स्टोरों की सूची तैयार की गई है, जिनके बिलिंग पैटर्न में असामान्य वृद्धि देखी गई है।

  • बल्क बिलिंग: कुछ मेडिकल स्टोरों ने एक ही दिन में एक ही परिवार के नाम पर कई बार अधिकतम लिमिट (Limit) तक बिलिंग की।

  • महंगी दवाइयों का खेल: कैंसर, हृदय रोग और किडनी की उन महंगी दवाइयों के बिल लगाए गए, जिनकी बाजार में कीमत बहुत अधिक है और जिन्हें आसानी से ‘ब्लैक’ में बेचा जा सकता है।

3. बिलिंग पैटर्न की गहराई से जांच

जांच टीमें अब डिजिटल फुटप्रिंट्स को खंगाल रही हैं। इसमें निम्नलिखित पहलुओं पर ध्यान दिया जा रहा है:

  • IP एड्रेस की जांच: क्या फर्जी बिलिंग किसी एक ही कंप्यूटर या स्थान से की जा रही थी?

  • ओटीपी (OTP) का खेल: योजना में पारदर्शिता के लिए ओटीपी की व्यवस्था है, लेकिन जांच में पाया गया कि कई मामलों में लाभार्थियों के फोन नंबर बदल दिए गए या उन्हें झांसा देकर ओटीपी ले लिया गया।

  • स्टॉक मिलान: मेडिकल स्टोर्स के फिजिकल स्टॉक और पोर्टल पर दर्ज बिक्री के बीच भारी अंतर पाया गया है।

4. आम जनता और कर्मचारियों पर प्रभाव

इस धांधली का सबसे बुरा असर उन ईमानदार कर्मचारियों और पेंशनभोगियों पर पड़ रहा है जिन्हें वास्तव में इलाज की जरूरत है।

  1. बजट की कमी: फर्जी बिलों के कारण योजना का फंड समय से पहले खत्म हो रहा है।

  2. सख्त नियम: घोटाले के बाद सरकार ने नियमों को और कड़ा कर दिया है, जिससे वास्तविक मरीजों को दवाइयां लेने में अधिक कागजी कार्रवाई और देरी का सामना करना पड़ रहा है।

  3. विश्वास का संकट: इस तरह के घोटालों से सरकार की कल्याणकारी योजनाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं।

5. संभावित कार्रवाई और भविष्य की राह

प्रशासन ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि इसमें शामिल किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा।

  • एफआईआर (FIR): फर्जीवाड़े में शामिल मेडिकल स्टोर और डॉक्टरों के खिलाफ धोखाधड़ी के मुकदमे दर्ज करने की तैयारी है।

  • लाइसेंस रद्द करना: दोषी पाए जाने वाले मेडिकल स्टोरों के ड्रग लाइसेंस और अस्पतालों का RGHS पैनल से नाम हमेशा के लिए हटाया जा सकता है।

  • रिकवरी: सरकार अवैध रूप से ली गई राशि की वसूली ब्याज सहित करने की योजना बना रही है।


निष्कर्ष

श्रीगंगानगर में RGHS घोटाला महज एक आर्थिक अपराध नहीं है, बल्कि यह उन हजारों लोगों के हक पर डाका है जो अपने स्वास्थ्य के लिए इस सरकारी सुरक्षा कवच पर निर्भर हैं। ऑडिट टीम की सक्रियता से यह उम्मीद जगी है कि भविष्य में AI-आधारित मॉनिटरिंग और बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन जैसे कड़े कदम उठाए जाएंगे ताकि ‘इलाज के नाम पर लूट’ का यह खेल बंद हो सके।

©️ श्री गंगानगर न्यूज़ ©️