
राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (RBSE) द्वारा हाल ही में दसवीं और बारहवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा शुल्क में की गई वृद्धि ने श्रीगंगानगर सहित समूचे राज्य के लाखों विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों के लिए एक बड़ी चिंता पैदा कर दी है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब कई परिवार अभी भी आर्थिक रूप से महामारी और महंगाई के दौर से उबरने का प्रयास कर रहे हैं। इस बढ़ोतरी ने शिक्षा को महंगा बनाने और निर्धन व मध्यम वर्ग के परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालने का काम किया है।
अभिभावकों की चिंता: बजट पर सीधा असर
श्रीगंगानगर में अभिभावक संघों (Parents’ Associations) और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बोर्ड के इस निर्णय पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उनका तर्क है कि बोर्ड परीक्षा शुल्क में हुई यह बढ़ोतरी, जो प्रति छात्र 10 से 20 प्रतिशत तक की है, सीधे तौर पर पारिवारिक बजट को प्रभावित करेगी। शिक्षा का खर्च, जिसमें ट्यूशन फीस, किताबें, यूनिफॉर्म और परिवहन शामिल है, पहले से ही काफी अधिक है। ऐसे में परीक्षा शुल्क का बढ़ना उन परिवारों के लिए विशेष रूप से कठिन है जहाँ एक से अधिक बच्चे बोर्ड की परीक्षा देने वाले हैं।
अभिभावकों का मानना है कि शिक्षा एक मौलिक अधिकार है, और सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इसे सुलभ और किफायती बनाए रखे। उनका कहना है कि शुल्क वृद्धि का यह कदम “शिक्षा को महंगा करने” जैसा है, जो संविधान में दिए गए शिक्षा के अधिकार के विपरीत जाता है।
निर्धन और वंचित वर्ग के छात्रों पर गहरा असर
शुल्क वृद्धि का सबसे गहरा असर आर्थिक रूप से कमजोर (EWS) और वंचित वर्ग के छात्रों पर पड़ेगा। कई बार, उच्च शुल्क के कारण ये छात्र या तो बोर्ड परीक्षा फॉर्म भरने में देरी करते हैं या कुछ मामलों में, उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
श्रीगंगानगर के शिक्षाविदों ने भी इस बात पर जोर दिया है कि बोर्ड को “सब्सिडी मॉडल” (Subsidy Model) अपनाना चाहिए। उनकी मांग है कि सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए शुल्क मामूली रूप से बढ़ाया जा सकता है, लेकिन निर्धन परिवारों के छात्रों के लिए रियायतें (Concessions) या पूर्ण शुल्क माफी की व्यवस्था होनी चाहिए। इससे यह सुनिश्चित होगा कि कोई भी छात्र सिर्फ पैसे की कमी के कारण बोर्ड परीक्षा से वंचित न रहे।
मांग: शुल्क वापस लिया जाए या रियायत दी जाए
अभिभावक संघों ने मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री को ज्ञापन भेजकर इस शुल्क वृद्धि को तत्काल वापस लेने की मांग की है। उनकी प्राथमिक मांग यह है कि बोर्ड को अपने खर्चे पूरे करने के लिए छात्रों पर बोझ डालने के बजाय, सरकारी अनुदान और अन्य वित्तीय स्रोतों का सहारा लेना चाहिए। अगर शुल्क वृद्धि आवश्यक है भी, तो इसे कम से कम रखा जाए और निर्धन छात्रों के लिए एक विशेष कोष बनाया जाए ताकि उनकी परीक्षा फीस का भुगतान किया जा सके। श्रीगंगानगर में यह मुद्दा अब शिक्षा और सामाजिक न्याय से जुड़ा एक महत्वपूर्ण विषय बन गया है।