
श्री गंगानगर। अनूपगढ़ पंचायत समिति में पिछले लगभग एक महीने से चल रहे विकास अधिकारी (BDO) विनोद रैगर और ग्राम पंचायतों के प्रशासकों (सरपंचों) के बीच के गतिरोध ने शुक्रवार, 29 नवंबर, को एक नाटकीय मोड़ ले लिया, जब राजस्थान उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार द्वारा जारी बीडीओ के एपीओ (अवेटिंग पोस्टिंग ऑर्डर) आदेश पर रोक लगा दी। इस कानूनी हस्तक्षेप के बाद, बीडीओ विनोद रैगर ने तत्काल प्रभाव से अनूपगढ़ पंचायत समिति में पुनः कार्यभार ग्रहण कर लिया।
विवाद की पृष्ठभूमि
यह विवाद अक्टूबर माह के अंत में शुरू हुआ था, जब ग्राम पंचायतों के प्रशासकों ने विकास कार्यों को लेकर बीडीओ विनोद रैगर पर सहयोग न करने और जानबूझकर देरी करने का आरोप लगाया था। प्रशासकों का कहना था कि बीडीओ की कार्यशैली के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्य बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं, और सरकारी योजनाओं का लाभ पात्र लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है।
प्रशासकों ने अपनी मांगों को लेकर पहले विरोध प्रदर्शन किया और फिर पंचायत समिति कार्यालय के बाहर लगातार धरना देना शुरू कर दिया। यह आंदोलन धीरे-धीरे उग्र होता गया। स्थानीय राजनीतिक दबाव और बढ़ते विरोध को देखते हुए, राज्य सरकार ने 25 नवंबर को विकास अधिकारी विनोद रैगर को एपीओ कर दिया। प्रशासनिक भाषा में एपीओ का अर्थ है कि अधिकारी को तत्काल प्रभाव से पद से हटाकर मुख्यालय से अटैच कर दिया जाता है, और उसे नई पोस्टिंग का इंतजार करना पड़ता है।
कानूनी चुनौती और उच्च न्यायालय का निर्णय
सरकार के एपीओ आदेश को बीडीओ विनोद रैगर ने राजस्थान उच्च न्यायालय में चुनौती दी। रैगर ने अपनी याचिका में तर्क दिया कि उन्हें प्रशासकों के राजनीतिक दबाव के चलते दुर्भावनापूर्ण तरीके से एपीओ किया गया है, जबकि उनके खिलाफ कोई ठोस विभागीय जांच या आरोप सिद्ध नहीं हुए हैं। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि प्रशासकों के आरोप निराधार हैं और वे केवल अपनी मनमानी चलाना चाहते हैं।
याचिका पर सुनवाई करते हुए, उच्च न्यायालय ने प्राथमिक तौर पर बीडीओ रैगर के पक्ष में राहत प्रदान की। न्यायालय ने पाया कि एपीओ आदेश जारी करने की प्रक्रिया में नियमों का उचित पालन नहीं किया गया और बिना किसी ठोस कारण या जांच के किसी अधिकारी को पद से हटाना न्यायसंगत नहीं है। 29 नवंबर को उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के एपीओ आदेशों पर स्थगन आदेश (Stay Order) जारी कर दिया।
प्रशासनिक प्रभाव और आगे की राह
उच्च न्यायालय का यह निर्णय न केवल विकास अधिकारी विनोद रैगर के लिए एक बड़ी राहत है, बल्कि यह स्थानीय प्रशासन और निर्वाचित/नियुक्त प्रतिनिधियों के बीच के शक्ति संतुलन पर भी एक महत्वपूर्ण टिप्पणी है। कोर्ट के आदेश के तुरंत बाद, बीडीओ विनोद रैगर ने अनूपगढ़ पंचायत समिति कार्यालय पहुंचकर अपना कार्यभार संभाल लिया।
अब सबकी निगाहें ग्राम पंचायतों के प्रशासकों पर टिकी हैं कि वे कोर्ट के इस निर्णय पर क्या रुख अपनाते हैं। यह आशंका है कि प्रशासक एक बार फिर से विरोध प्रदर्शन शुरू कर सकते हैं, जिससे पंचायत समिति में गतिरोध और तनाव की स्थिति बनी रह सकती है। यह मामला अब कानूनी पेंच और स्थानीय राजनीति के बीच फंस गया है। प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर चर्चा है कि सरकार इस स्थगन आदेश के विरुद्ध अपील करती है या बीडीओ को उनके पद पर बने रहने देती है।
फिलहाल, उच्च न्यायालय के आदेश ने अस्थाई रूप से बीडीओ को पद पर बहाल कर दिया है, लेकिन विवाद की जड़ें अभी भी मौजूद हैं। अनूपगढ़ में प्रशासनिक कार्य सुचारू रूप से चल सकें, इसके लिए स्थानीय प्रतिनिधियों और प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय और संवाद की आवश्यकता है, जिसे स्थापित करना अब एक बड़ी चुनौती होगी।