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सेवण घास: थार का ‘अमृत’ संकट में

श्रीगंगानगर के सूरतगढ़, अनूपगढ़ और बीकानेर से सटे सीमावर्ती इलाकों में सेवण घास न केवल एक वनस्पति है, बल्कि यह यहाँ की पशुपालन आधारित अर्थव्यवस्था का आधार है। वैज्ञानिक रूप से अत्यंत पौष्टिक मानी जाने वाली यह घास अब धीरे-धीरे लुप्त होने की कगार पर है।

1. क्यों कहा जाता है इसे ‘रेगिस्तान का सोना’?

सेवण घास को इसकी अद्वितीय खूबियों के कारण यह नाम दिया गया है:

  • प्रोटीन का भंडार: इसमें 8% से 10% तक प्रोटीन पाया जाता है, जो रेगिस्तानी परिस्थितियों में उगने वाली किसी भी अन्य घास से कहीं अधिक है।

  • कम पानी में जीवन: यह घास शून्य से भी कम नमी में सालों तक जीवित रह सकती है। एक बार अच्छी बारिश हो जाए, तो इसकी जड़ें सालों तक जमीन में सुरक्षित रहती हैं।

  • दूध की गुणवत्ता: विशेषज्ञों का मानना है कि सेवण घास चरने वाली गायों (विशेषकर राठी और साहीवाल) के दूध में फैट और SNF (Solid Not Fat) की मात्रा प्राकृतिक रूप से अधिक होती है।

2. संकट के मुख्य कारण

सेवण के कम होने के पीछे मानवीय और व्यावसायिक कारण प्रमुख हैं:

  • बढ़ता अतिक्रमण: श्रीगंगानगर और सूरतगढ़ क्षेत्र में इंदिरा गांधी नहर के आने के बाद चारागाहों (गोचर भूमि) को व्यावसायिक खेती में बदल दिया गया है। जहाँ कभी सेवण के ऊँचे-ऊँचे झुंड होते थे, वहाँ अब नरमा और ग्वार की खेती हो रही है।

  • अत्यधिक चराई (Overgrazing): चरागाहों का क्षेत्रफल घटने के बावजूद पशुओं की संख्या बढ़ी है। घास को पनपने का समय मिलने से पहले ही उसे चर लिया जाता है, जिससे इसके बीज नहीं बन पाते।

  • ट्रैक्टरों का प्रयोग: आधुनिक खेती के लिए ट्रैक्टरों के चलने से जमीन की ऊपरी परत और सेवण की पुरानी जड़ें नष्ट हो गई हैं।

3. पशुपालकों और डेयरी उद्योग पर प्रभाव

इस संकट का सबसे बड़ा प्रहार ग्रामीण आय पर हुआ है। पशुपालकों का कहना है कि अब उन्हें बाहर से महंगा सूखा चारा और खल-बिनौला खरीदना पड़ता है।

“पहले हमारी गायें सेवण के मैदानों में चरकर ही भरपूर और गाढ़ा दूध देती थीं। अब कृत्रिम चारे के कारण दूध की लागत बढ़ गई है और पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कम हो रही है।” – सूरतगढ़ के एक स्थानीय पशुपालक

4. विशेषज्ञों की चेतावनी और समाधान

कृषि और वन विभाग के विशेषज्ञों के अनुसार, यदि सेवण घास पूरी तरह लुप्त हो गई, तो थार के मरुस्थल में मृदा अपरदन (Soil Erosion) बढ़ जाएगा। इसकी जड़ें रेत को बांधकर रखती हैं।

  • संरक्षित क्षेत्र: सरकार को ‘सीड फार्म’ (Seed Farms) विकसित करने चाहिए जहाँ सेवण के बीजों को सहेज कर रखा जा सके।

  • सामुदायिक प्रयास: गांवों में ‘ओरण’ और ‘गोचर’ भूमि को पुनर्जीवित करना अनिवार्य है ताकि स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र बना रहे।


निष्कर्ष: सेवण घास का लुप्त होना केवल एक वनस्पति का नुकसान नहीं है, बल्कि यह श्रीगंगानगर की पारंपरिक पशुपालन संस्कृति का अंत हो सकता है। समय रहते इस ‘सोने’ को बचाने के लिए नीतिगत और जमीनी स्तर पर प्रयास आवश्यक हैं।

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