
श्रीगंगानगर जिला शिक्षा अधिकारी (माध्यमिक) द्वारा हाल ही में जारी किया गया एक आदेश जिले के शैक्षणिक गलियारों और सोशल मीडिया पर चर्चा का मुख्य विषय बन गया है। यह आदेश विशेष रूप से क्रिसमस के त्यौहार के दौरान निजी और सरकारी स्कूलों में बच्चों को सांता क्लॉज की वेशभूषा पहनाने से जुड़ा है। प्रशासन के इस कदम ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है, जिसमें एक पक्ष इसे सांस्कृतिक स्वतंत्रता मान रहा है, तो दूसरा इसे बच्चों पर थोपे जाने वाले बाहरी रिवाजों पर लगाम के रूप में देख रहा है।
आदेश की मुख्य बातें
जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा जारी आधिकारिक नोटिस में स्पष्ट कहा गया है कि कोई भी स्कूल प्रबंधन, चाहे वह निजी हो या सरकारी, किसी भी छात्र को क्रिसमस कार्यक्रमों के दौरान सांता क्लॉज बनने या उसकी विशेष ड्रेस पहनने के लिए मजबूर नहीं करेगा। आदेश में दो प्रमुख बिंदुओं पर जोर दिया गया है:
-
अभिभावकों की लिखित सहमति: यदि स्कूल कोई ऐसा आयोजन करता है जिसमें बच्चों को सांता क्लॉज की ड्रेस पहननी है, तो इसके लिए स्कूल को संबंधित छात्र के माता-पिता या अभिभावक से लिखित अनुमति लेनी अनिवार्य होगी।
-
अनुशासनात्मक कार्रवाई: यदि किसी अभिभावक की शिकायत प्राप्त होती है कि उनके बच्चे को उसकी इच्छा या धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध सांता क्लॉज बनाया गया है, तो उस स्कूल के खिलाफ शिक्षा विभाग सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई करेगा।
विवाद का मुख्य कारण
यह आदेश अचानक जारी नहीं हुआ है। दरअसल, पिछले कुछ वर्षों से कई हिंदूवादी संगठनों और अभिभावक समूहों द्वारा यह मांग उठाई जा रही थी कि कॉन्वेंट और निजी स्कूलों में भारतीय संस्कृति के बजाय पश्चिमी परंपराओं को प्राथमिकता दी जा रही है। संगठनों का तर्क है कि बच्चों को जबरन सांता क्लॉज बनाना उनकी मूल संस्कृति से दूर ले जाने का एक प्रयास है।
दूसरी ओर, शिक्षा विभाग का तर्क है कि यह आदेश किसी त्यौहार के खिलाफ नहीं है, बल्कि ‘व्यक्तिगत पसंद की स्वतंत्रता’ सुनिश्चित करने के लिए है। विभाग का कहना है कि स्कूलों को शिक्षा पर ध्यान देना चाहिए और किसी भी बच्चे पर कोई विशेष धार्मिक वेशभूषा नहीं थोपनी चाहिए।
अभिभावकों और स्कूलों की प्रतिक्रिया
इस आदेश पर श्रीगंगानगर के समाज में मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है:
-
समर्थक पक्ष: कई अभिभावकों ने इस फैसले का स्वागत किया है। उनका मानना है कि सांता क्लॉज की ड्रेस और अन्य सामान खरीदने के लिए स्कूलों द्वारा बनाया जाने वाला दबाव मध्यमवर्गीय परिवारों पर आर्थिक बोझ भी डालता है। साथ ही, वे इसे अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने के कदम के रूप में देख रहे हैं।
-
विरोधी पक्ष: शिक्षाविदों और ईसाई समुदाय के कुछ प्रतिनिधियों का मानना है कि स्कूल विविधता और भाईचारे का प्रतीक होते हैं। क्रिसमस पर सांता क्लॉज बनना बच्चों के लिए केवल मनोरंजन और उपहारों का प्रतीक है, न कि किसी धर्म का प्रचार। उनका तर्क है कि ऐसे आदेश समाज में अनावश्यक दूरियां पैदा कर सकते हैं।
निष्कर्ष
श्रीगंगानगर जिला प्रशासन का यह कदम राजस्थान के अन्य जिलों में भी चर्चा का विषय बन सकता है। फिलहाल, सभी स्कूलों को हिदायत दी गई है कि वे क्रिसमस समारोहों के दौरान मर्यादा और स्वैच्छिकता का पालन करें। शिक्षा विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि उसका प्राथमिक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि स्कूलों में बच्चों का मानसिक और शैक्षिक विकास बिना किसी बाहरी सांस्कृतिक दबाव के हो सके।