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श्रीगंगानगर: शहादत को नमन—रिद्धि-सिद्धि मॉल के बाहर सजी ‘दस्तारा द लंगर’ की अनूठी सेवा

श्रीगंगानगर। सरहिंद की उन दीवारों और चमकौर की उस मिट्टी की गाथा आज भी हर भारतीय के हृदय में जोश भर देती है। इसी ‘सफर-ए-शहादत’ को समर्पित करते हुए, श्रीगंगानगर के रिद्धि-सिद्धि मॉल के मुख्य द्वार पर 4 जनवरी को एक बेहद गरिमामयी और धार्मिक कार्यक्रम ‘दस्तारा द लंगर’ का आयोजन किया गया। टेरा खालसा फाउंडेशन द्वारा आयोजित इस अनूठी सेवा ने न केवल शहरवासियों का ध्यान खींचा, बल्कि नई पीढ़ी को सिख इतिहास के गौरवशाली पन्नों से भी रूबरू करवाया।

शहादत को समर्पित एक विशेष प्रयास

दिसंबर और जनवरी का यह समय सिख इतिहास में ‘शहादत पखवाड़े’ के रूप में जाना जाता है। दशमेश पिता गुरु गोविंद सिंह जी के चारों साहिबजादों—बाबा अजीत सिंह, बाबा जुझार सिंह, बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह—तथा माता गुजरी जी की लासानी शहादत को याद करते हुए इस कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की गई थी। आयोजकों का मुख्य उद्देश्य था कि समाज के हर वर्ग, विशेषकर युवाओं को यह संदेश दिया जाए कि ‘दस्तार’ (पगड़ी) केवल एक कपड़ा नहीं, बल्कि सम्मान, जिम्मेदारी और पहचान का प्रतीक है।

केसरिया और नीले रंगों से सराबोर हुआ परिसर

सुबह से ही टेरा खालसा फाउंडेशन के सेवादार रिद्धि-सिद्धि मॉल के बाहर एकत्र होने लगे थे। कार्यक्रम स्थल को धार्मिक बैनरों और फूलों से सजाया गया था। जैसे ही ‘दस्तारा द लंगर’ की शुरुआत हुई, बड़ी संख्या में युवा, बच्चे और बुजुर्ग वहां जुटने लगे।

  • निःशुल्क दस्तार बंदी: इस लंगर की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यहां भोजन के बजाय ‘दस्तार’ का लंगर लगाया गया था। विशेषज्ञ सेवादारों ने संगत के सिरों पर बहुत ही सुंदर और सलीके से पगड़ी सजाई।

  • सिख पहचान का गौरव: फाउंडेशन के सदस्यों ने बताया कि आज के दौर में जब युवा अपनी संस्कृति से दूर हो रहे हैं, ऐसे में उन्हें अपनी जड़ों से जोड़ना अनिवार्य है।

युवाओं में दिखा भारी उत्साह

रिद्धि-सिद्धि मॉल, जो शहर का एक प्रमुख व्यावसायिक केंद्र है, वहां आने वाले युवाओं ने इस पहल में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। कई गैर-सिख युवाओं ने भी श्रद्धा भाव से अपने सिर पर दस्तार सजवाई और साहिबजादों की शहादत के बारे में जानकारी ली। पूरे क्षेत्र में “बोले सो निहाल, सत श्री अकाल” के जयकारों से वातावरण भक्तिमय हो गया।

इतिहास की दी गई जानकारी

कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं और सेवादारों ने छोटे साहिबजादों की बहादुरी के किस्से सुनाए। उन्होंने बताया कि किस तरह नन्हे साहिबजादों ने धर्म और सत्य की रक्षा के लिए दीवारों में चिना जाना स्वीकार किया, लेकिन मुगल हुकूमत के आगे सिर नहीं झुकाया। इस वीरतापूर्ण इतिहास को सुनकर उपस्थित संगत की आंखें नम हो गईं।

सेवा और भाईचारे का संदेश

टेरा खालसा फाउंडेशन के प्रतिनिधियों ने इस अवसर पर कहा कि श्रीगंगानगर हमेशा से सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल रहा है। इस तरह के आयोजनों से समाज में एकता का संचार होता है। दस्तार सजाने के साथ-साथ वहां आए लोगों के लिए जलपान और चाय की भी व्यवस्था की गई थी, लेकिन मुख्य आकर्षण ‘दस्तार’ ही रही।

निष्कर्ष: रिद्धि-सिद्धि मॉल के बाहर आयोजित यह ‘दस्तारा द लंगर’ केवल एक आयोजन मात्र नहीं था, बल्कि यह उन महान बलिदानों के प्रति एक विनम्र श्रद्धांजलि थी, जिन्होंने देश और कौम के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। इस कार्यक्रम ने सिद्ध कर दिया कि श्रीगंगानगर की जनता अपनी विरासत और इतिहास को सहेजने के लिए सदैव तत्पर है।

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