
प्रस्तावना
राजस्थान की स्वास्थ्य प्रणाली में ‘आयुष्मान आरोग्य मंदिर’ (पूर्व में जनता क्लीनिक और स्वास्थ्य केंद्र) आमजन को उनके घर के समीप प्राथमिक चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने का एक प्रमुख जरिया हैं। हाल ही में राज्य सरकार द्वारा इन केंद्रों के कार्य समय में बदलाव करते हुए ‘दो पालियों’ (डबल शिफ्ट) में कार्य करने के आदेश जारी किए गए हैं। श्रीगंगानगर जिले में इस फैसले ने एक बड़े विवाद का रूप ले लिया है, जहाँ स्वास्थ्य कर्मियों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
विरोध का मुख्य कारण: ‘राजस्थान शहरी आयुष्मान आरोग्य मंदिर कार्मिक संघ’ का पक्ष
श्रीगंगानगर में ‘राजस्थान शहरी आयुष्मान आरोग्य मंदिर कार्मिक संघ’ ने इस आदेश को पूरी तरह से अव्यावहारिक करार दिया है। कर्मचारियों का तर्क है कि इस बदलाव से न केवल उनकी व्यक्तिगत और पारिवारिक स्थिति प्रभावित होगी, बल्कि कार्यक्षमता पर भी बुरा असर पड़ेगा।
1. संसाधनों और स्टाफ की कमी: संघ का कहना है कि अधिकांश केंद्रों पर पहले से ही कर्मचारियों की भारी कमी है। एक ही स्टाफ से सुबह और शाम, दोनों पालियों में काम लेना उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है। जब पर्याप्त मैनपावर ही नहीं है, तो दो पालियों में गुणवत्तापूर्ण सेवा देना लगभग असंभव है।
2. सुरक्षा और परिवहन की समस्या: शहरी क्षेत्रों में कई आरोग्य मंदिर ऐसे इलाकों में स्थित हैं जहाँ देर शाम तक काम करना, विशेषकर महिला कर्मचारियों के लिए सुरक्षा की दृष्टि से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसके अलावा, दो बार केंद्र पर आने-जाने से कर्मचारियों पर आर्थिक बोझ और समय की बर्बादी भी बढ़ेगी।
क्या है सरकार का तर्क?
सरकार का प्राथमिक उद्देश्य इन केंद्रों के माध्यम से आम जनता को अधिक समय तक स्वास्थ्य लाभ पहुँचाना है। अक्सर कामकाजी वर्ग सुबह के समय अस्पताल नहीं जा पाता, इसलिए शाम की शिफ्ट शुरू करने से श्रमिक और नौकरीपेशा लोग भी निःशुल्क जांच और दवाइयों का लाभ उठा सकेंगे। सरकार इसे ‘सुशासन’ और ‘सेवा विस्तार’ के रूप में देख रही है, ताकि अस्पतालों की ओपीडी (OPD) पर पड़ने वाले अतिरिक्त भार को कम किया जा सके।
श्रीगंगानगर के स्थानीय संदर्भ में चुनौतियाँ
श्रीगंगानगर एक सीमावर्ती जिला है जहाँ की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियां अन्य शहरों से भिन्न हैं। यहाँ के कार्मिक संघ का कहना है कि सरकार को आदेश थोपने से पहले स्थानीय स्तर पर बुनियादी ढांचे का आकलन करना चाहिए था।
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अव्यावहारिकता: कर्मचारियों के अनुसार, शाम के समय मरीजों की संख्या सुबह की तुलना में काफी कम रहती है, जिससे अतिरिक्त शिफ्ट का औचित्य कम हो जाता है।
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आर्थिक हित: कार्मिकों को डर है कि उनके मानदेय या वेतन में बिना किसी विशेष बढ़ोतरी के उन पर काम का बोझ दोगुना किया जा रहा है, जो श्रम नियमों के विरुद्ध है।
संभावित परिणाम और जनहित
यदि सरकार और कर्मचारियों के बीच यह गतिरोध बना रहता है, तो इसका सीधा असर श्रीगंगानगर की जनता पर पड़ेगा।
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हड़ताल का खतरा: यदि कार्मिक संघ कार्य बहिष्कार पर जाता है, तो टीकाकरण, प्रसव पूर्व जांच (ANC) और सामान्य ओपीडी सेवाएं ठप हो सकती हैं।
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सेवा की गुणवत्ता में गिरावट: थके हुए और असंतुष्ट स्वास्थ्य कर्मी मरीजों को वह देखभाल प्रदान नहीं कर पाएंगे जिसकी उनसे अपेक्षा की जाती है।
निष्कर्ष एवं समाधान का मार्ग
किसी भी व्यवस्था परिवर्तन के लिए संवाद (Dialogue) सबसे महत्वपूर्ण होता है। श्रीगंगानगर में बढ़ता यह विरोध दर्शाता है कि नीति निर्माण के दौरान जमीनी स्तर के कर्मचारियों के हितों को नजरअंदाज किया गया है।
समाधान के लिए सरकार को चाहिए कि वह:
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रिक्त पदों पर नई भर्तियां करे ताकि शिफ्ट रोटेशन आसानी से हो सके।
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डबल शिफ्ट में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए विशेष भत्ते या प्रोत्साहन राशि की घोषणा करे।
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सुरक्षा और परिवहन की पुख्ता व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
वर्तमान स्थिति में, जब तक सरकार और ‘राजस्थान शहरी आयुष्मान आरोग्य मंदिर कार्मिक संघ’ एक मेज पर बैठकर समाधान नहीं निकालते, तब तक श्रीगंगानगर की स्वास्थ्य सेवाओं पर अनिश्चितता के बादल मंडराते रहेंगे।