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श्रीगंगानगर में सिंचाई संकट: रबी की फसल को बचाने के लिए किसानों ने खोला मोर्चा

श्रीगंगानगर,

राजस्थान के सीमावर्ती जिले श्रीगंगानगर में खेती का पूरा दारोमदार नहरी तंत्र पर टिका है। मार्च का महीना आते ही रबी की फसलें (विशेषकर गेहूं और सरसों) अपने पकने के अंतिम चरण में पहुंच चुकी हैं। इस नाजुक समय पर फसलों को “अंतिम सिंचाई” (Last Watering) की सख्त जरूरत होती है। आज 5 मार्च को जिले के विभिन्न किसान संगठनों ने सिंचाई विभाग के कार्यालयों पर दस्तक दी और गंगनहर तथा इंदिरा गांधी नहर परियोजना (IGNP) में पानी की उपलब्धता बढ़ाने की पुरजोर मांग की।


अंतिम सिंचाई का महत्व: दाने की चमक और वजन पर संकट

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, मार्च की शुरुआत में गेहूं की बालियों में दाना भरने की प्रक्रिया (Grain Filling Stage) अपने चरम पर होती है। इस समय यदि पौधों को पर्याप्त पानी नहीं मिलता, तो दाना सिकुड़ जाता है और उसका वजन कम हो जाता है। आज प्रदर्शन कर रहे किसानों का तर्क है कि इस समय की एक सिंचाई फसल की पैदावार में 15 से 20 प्रतिशत तक का अंतर पैदा कर सकती है।

किसानों ने अधिकारियों को अवगत कराया कि यदि अगले एक सप्ताह के भीतर नहरों में पानी का पूरा ‘रेगुलेशन’ (बारी) नहीं मिला, तो पूरे साल की मेहनत पर पानी फिर सकता है। विशेष रूप से गंगनहर के टेल (अंतिम छोर) पर स्थित गांवों में पानी की किल्लत सबसे अधिक देखी जा रही है।

गंगनहर और आईजीएनपी: वर्तमान स्थिति

श्रीगंगानगर जिला मुख्य रूप से दो बड़ी नहर प्रणालियों पर निर्भर है:

  1. गंगनहर प्रणाली: यहाँ के किसानों की मांग है कि पंजाब से आने वाले पानी के हिस्से में कटौती न की जाए। वर्तमान में रोटेशन के कारण कई वितरिकाओं (Distributaries) में पानी की कमी है।

  2. इंदिरा गांधी नहर (IGNP): पश्चिमी राजस्थान की इस जीवन रेखा में फिलहाल पेयजल के लिए आरक्षित पानी को प्राथमिकता दी जा रही है, जिससे सिंचाई के लिए मिलने वाले पानी की मात्रा कम हो गई है।

किसान नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि सिंचाई विभाग ने पंजाब प्रशासन से तालमेल बैठाकर पानी की मात्रा नहीं बढ़ाई, तो वे कलेक्ट्रेट पर महापड़ाव डालने को मजबूर होंगे।


सिंचाई विभाग का पक्ष और चुनौतियां

दूसरी ओर, सिंचाई विभाग के अधिकारियों का कहना है कि पीछे से (हरिके बैराज और अन्य हेड से) पानी की आवक ही कम है। बांधों में जलस्तर की स्थिति और आगामी गर्मियों के लिए पेयजल भंडारण की मजबूरी के कारण सिंचाई के पानी में कड़ाई बरतनी पड़ रही है। हालांकि, आज की बैठक के बाद विभाग ने आश्वासन दिया है कि वे रोटेशन चार्ट में बदलाव कर यह सुनिश्चित करेंगे कि हर चक (Chak) तक कम से कम एक बार पानी पहुंच सके।

किसान संगठनों की प्रमुख मांगें:

  • रोटेशन में सुधार: नहरों की बारी को इस तरह से सेट किया जाए कि पकती फसलों को तुरंत पानी मिले।

  • टेल तक पानी की पहुंच: अंतिम छोर के किसानों को पानी चोरी रोकने के लिए पुलिस गश्त की मांग।

  • मुआवजे का प्रावधान: यदि पानी की कमी से फसल खराब होती है, तो सरकार विशेष गिरदावरी करवाकर मुआवजे का ऐलान करे।


खेती पर पड़ने वाला आर्थिक प्रभाव

श्रीगंगानगर की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से कृषि आधारित है। अगर गेहूं और सरसों की पैदावार कम होती है, तो इसका सीधा असर जिले की मंडियों और व्यापारियों पर पड़ेगा। एक अनुमान के अनुसार, अंतिम सिंचाई न मिलने से जिले को करोड़ों रुपये का राजस्व नुकसान हो सकता है। किसान इस समय दोहरी मार झेल रहे हैं—एक तरफ बढ़ता तापमान और दूसरी तरफ पानी की अनिश्चितता।

निष्कर्ष

5 मार्च की यह हलचल दर्शाती है कि श्रीगंगानगर का किसान अपनी फसल बचाने के लिए कितना संघर्षशील है। नहरों में पानी का आना केवल तकनीकी मामला नहीं है, बल्कि यह हजारों परिवारों की आजीविका का सवाल है। प्रशासन और किसान संगठनों के बीच चल रही यह वार्ता आने वाले दिनों में क्या रुख लेती है, इस पर पूरे जिले की नजरें टिकी हैं।

©️ श्री गंगानगर न्यूज़ ©️