
श्रीगंगानगर की भौगोलिक स्थिति इसे बेहद संवेदनशील बनाती है। अंतरराष्ट्रीय सीमा (Indo-Pak Border) से सटा होने के कारण यहाँ नशीले पदार्थों की तस्करी एक बड़ी चुनौती रही है। हाल के दिनों में पुलिस अधीक्षक (SP) के नेतृत्व में चलाए गए विशेष अभियान ने तस्करी के नेटवर्क को जड़ से हिला दिया है।
1. अवैध संपत्तियों पर ‘पीला पंजा’: आर्थिक चोट
पुलिस की रणनीति अब केवल गिरफ्तारियों तक सीमित नहीं है। अब पुलिस तस्करों की आर्थिक रीढ़ पर प्रहार कर रही है। हाल ही में की गई कार्रवाई में:
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अतिक्रमण मुक्त भूमि: तस्करों द्वारा नशे की कमाई से सरकारी भूमि पर किए गए अवैध कब्जों को चिह्नित किया गया। करीब 2.5 करोड़ रुपये की बाजार कीमत वाली सरकारी जमीन पर बने अवैध निर्माणों को बुलडोजर चलाकर ढहा दिया गया।
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संपत्ति कुर्की: एनडीपीएस (NDPS) एक्ट की धाराओं के तहत पुलिस उन संपत्तियों को फ्रीज कर रही है जो नशीले पदार्थों की अवैध बिक्री से अर्जित की गई हैं। प्रशासन का मानना है कि जब तक तस्करों की आर्थिक शक्ति बनी रहेगी, वे जेल से बाहर आते ही फिर से सक्रिय हो जाएंगे।
2. सीमावर्ती इलाकों में ‘नशा मुक्ति चौपाल’
केवल डंडे के जोर पर नशे को खत्म करना संभव नहीं है, इसके लिए सामाजिक चेतना की भी आवश्यकता है। इसी सोच के साथ पुलिस ने ‘नशा मुक्ति चौपाल’ की शुरुआत की है:
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युवाओं से संवाद: सीमा के पास स्थित गांवों (जैसे रायसिंहनगर, अनूपगढ़ और केसरीसिंहपुर बेल्ट) में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी खुद जाकर युवाओं से संवाद कर रहे हैं।
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जागरूकता अभियान: इन चौपालों में नशे के शारीरिक, मानसिक और कानूनी दुष्प्रभावों के बारे में बताया जा रहा है।
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खेल और मुख्यधारा: युवाओं को नशे से दूर रखने के लिए पुलिस स्थानीय स्तर पर खेल प्रतियोगिताओं को बढ़ावा दे रही है ताकि उनकी ऊर्जा सही दिशा में लग सके।
3. तकनीक और इंटेलिजेंस का समन्वय
नशे के खिलाफ इस जंग में अब आधुनिक तकनीक का सहारा लिया जा रहा है:
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ड्रोन निगरानी: भारत-पाक सीमा के पास ड्रोन के माध्यम से होने वाली तस्करी को रोकने के लिए बीएसएफ (BSF) और राजस्थान पुलिस के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया गया है।
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एंटी-नारकोटिक्स सेल: जिले में एक विशेष सेल का गठन किया गया है जो केवल बड़े सप्लायरों और ‘किंगपिन’ पर नजर रखती है। छोटे पैडलर्स के बजाय अब उन मगरमच्छों को पकड़ा जा रहा है जो पंजाब और हरियाणा से सिंथेटिक ड्रग्स (जैसे चिट्टा) की सप्लाई कर रहे हैं।
4. पुनर्वास: जेल नहीं, सुधार केंद्र
पुलिस का एक मानवीय चेहरा भी सामने आया है। अभियान के तहत उन युवाओं को चिन्हित किया जा रहा है जो तस्करी नहीं करते, बल्कि खुद नशे के आदि (Addicts) हो चुके हैं।
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नशा मुक्ति केंद्र: ऐसे युवाओं को अपराधी मानकर जेल भेजने के बजाय सरकारी और निजी नशा मुक्ति केंद्रों में भर्ती कराया जा रहा है।
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काउंसलिंग: परिवारों को प्रेरित किया जा रहा है कि वे अपने बच्चों को छुपाने के बजाय उनका इलाज करवाएं।
5. जनता का सहयोग और ‘मुखबिर’ तंत्र
इस अभियान की सफलता का एक बड़ा श्रेय जिले की जागरूक जनता को जाता है। पुलिस ने गुप्त हेल्पलाइन नंबर जारी किए हैं, जिस पर सूचना देने वाले का नाम पूरी तरह गुप्त रखा जाता है। इससे पुलिस को उन ठिकानों की सटीक जानकारी मिल रही है जहाँ से नशे का कारोबार संचालित हो रहा था।
निष्कर्ष: श्रीगंगानगर पुलिस की यह दोहरी रणनीति—एक तरफ अपराधियों पर कठोर ‘बुलडोजर कार्रवाई’ और दूसरी तरफ युवाओं के लिए ‘प्यार भरी चौपाल’—जिले की तस्वीर बदल रही है। 2.5 करोड़ की संपत्ति पर चला बुलडोजर एक कड़ा संदेश है कि अपराध की कमाई कभी फलीभूत नहीं होती। यदि यह अभियान इसी गति से जारी रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब श्रीगंगानगर फिर से अपनी हरियाली और खुशहाली के लिए ही जाना जाएगा, नशे के लिए नहीं।