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श्रीगंगानगर में ‘किनू महाकुंभ’ का आगाज़: उत्सव के शोर में दबी किसानों की बुनियादी मांगें

श्रीगंगानगर। राजस्थान के ‘अन्न भंडार’ और किनू उत्पादन के लिए देश भर में विख्यात श्रीगंगानगर जिले में 23 जनवरी से 25 जनवरी 2026 तक राज्य स्तरीय ‘किनू महाकुंभ’ (कृषक मेला) का आयोजन किया जा रहा है। जिला प्रशासन और कृषि विभाग ने इस आयोजन को भव्य बनाने के लिए अपनी सभी तैयारियां पूरी कर ली हैं। हालांकि, एक तरफ जहां प्रशासन इसे किनू उत्पादकों के लिए एक बड़ा मंच बता रहा है, वहीं दूसरी तरफ जिले के किसानों की प्रतिक्रिया काफी मिली-जुली और चिंताजनक है।

आयोजन की भव्यता और उद्देश्य

जिला कलेक्टर के निर्देशन में आयोजित होने वाले इस तीन दिवसीय मेले का मुख्य उद्देश्य किनू की ब्रांडिंग करना, नई तकनीकों का प्रदर्शन करना और प्रगतिशील किसानों को सम्मानित करना है। मेले में कृषि प्रदर्शनी, निजी कंपनियों के स्टॉल और विशेषज्ञों द्वारा सेमिनार आयोजित किए जाएंगे। प्रशासन का मानना है कि ऐसे आयोजनों से श्रीगंगानगर के किनू को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलेगी और निर्यात के नए रास्ते खुलेंगे।


किसानों का दर्द: चमक के पीछे का अंधेरा

भले ही शहर को मेलों के पोस्टरों से पाट दिया गया हो, लेकिन बागों में खड़ा किसान आज भी खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है। किसानों का कहना है कि उत्सवों से ज्यादा उन्हें धरातल पर समाधान की आवश्यकता है।

1. गिरते दाम और बाजार की अनिश्चितता: किसानों की सबसे बड़ी समस्या किनू के गिरते दाम हैं। इस साल उत्पादन में वृद्धि (लगभग 3.5 लाख टन) होने की उम्मीद है, लेकिन बम्पर फसल होने पर अक्सर दाम गिर जाते हैं। किसानों का आरोप है कि उन्हें प्रति किलो किनू के लिए उचित मूल्य नहीं मिल पाता, जबकि बाजार में वही किनू कई गुना महंगे दामों पर बिकता है। जिले में प्रसंस्करण (Processing Unit) और जूस फैक्ट्री की कमी के कारण किसानों को बिचौलियों पर निर्भर रहना पड़ता है।

2. सिंचाई के पानी की किल्लत: श्रीगंगानगर की खेती पूरी तरह से नहरों पर निर्भर है। पिछले कई महीनों से गंगनहर और आईजीएनपी में पानी की भारी किल्लत देखी जा रही है। नहरबंदी और पंजाब से कम पानी छोड़े जाने के कारण किनू के बाग सूखने की कगार पर हैं। किसानों का कहना है कि सरकार उत्सव तो मना रही है, लेकिन “बिना पानी के किनू का रस कहाँ से आएगा?”

3. अनुसंधान और सरकारी सहायता का अभाव: बागवानी क्षेत्र में बीमारियों (जैसे सिट्रस कैंकर) और कीटों के हमले से फसलों को भारी नुकसान होता है। किसानों का तर्क है कि सरकारी नर्सरियों में गुणवत्तापूर्ण पौधों की कमी है, जिससे उन्हें महंगे दामों पर निजी नर्सरियों से पौधे खरीदने पड़ते हैं।

निष्कर्ष: केवल मेला काफी नहीं

किसानों का स्पष्ट संदेश है कि उन्हें केवल प्रदर्शनियों और सम्मान की नहीं, बल्कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) जैसी सुरक्षा और सिंचाई के पक्के समाधान की जरूरत है। यदि सरकार किनू को वास्तव में ‘पंच गौरव’ के रूप में स्थापित करना चाहती है, तो उसे निर्यात की नीतियों को सरल बनाने और जिले में फूड प्रोसेसिंग हब स्थापित करने पर ध्यान देना होगा।

©️ श्री गंगानगर न्यूज़ ©️