
राजस्थान के उत्तरी छोर पर स्थित श्रीगंगानगर जिला इन दिनों एक गंभीर ऊर्जा संकट से जूझ रहा है। जिले के कई हिस्सों, विशेषकर श्रीकरणपुर, गजसिंहपुर और पदमपुर जैसे सीमावर्ती इलाकों में पेट्रोल और डीजल की भारी किल्लत देखी जा रही है। सुबह होते ही पेट्रोल पंपों के बाहर वाहनों की लंबी कतारें लग जाती हैं, लेकिन घंटों इंतजार के बाद भी कई उपभोक्ताओं को खाली हाथ लौटना पड़ रहा है।
‘नो स्टॉक’ के बोर्ड और जनता की बेबसी
पिछले कुछ दिनों से श्रीकरणपुर क्षेत्र के अधिकांश निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के पेट्रोल पंपों पर ‘No Stock’ के बोर्ड लटके नजर आ रहे हैं। जिन इक्का-दुक्का पंपों पर तेल उपलब्ध है, वहां अफरा-तफरी का माहौल है।
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लंबी कतारें: लोग सुबह 4 बजे से ही अपनी बारी का इंतजार करने लगते हैं।
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राशनिंग की स्थिति: कई पंप संचालकों ने तेल की सीमित मात्रा तय कर दी है (जैसे एक बाइक को अधिकतम 200-300 रुपये का पेट्रोल), ताकि अधिक से अधिक लोगों को थोड़ा-बहुत ईंधन मिल सके।
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कालाबाजारी का डर: किल्लत के बीच ग्रामीण इलाकों में बोतलों और ड्रमों में ऊंचे दामों पर पेट्रोल बेचे जाने की खबरें भी सामने आ रही हैं, जो सुरक्षा की दृष्टि से भी खतरनाक है।
कृषि प्रधान जिले पर दोहरी मार
श्रीगंगानगर एक कृषि प्रधान जिला है और वर्तमान में फसलों की कटाई तथा आगामी बुवाई की तैयारियों का समय है। डीजल की कमी ने सीधे तौर पर किसानों की कमर तोड़ दी है:
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ट्रैक्टर और मशीनरी ठप: खेतों में चलने वाले ट्रैक्टर, कंबाइन हार्वेस्टर और थ्रेशर डीजल के बिना खड़े हैं। किसान अपने खाली ड्रम लेकर एक पंप से दूसरे पंप के चक्कर काट रहे हैं।
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लागत में वृद्धि: समय पर कटाई न होने से फसल खराब होने का डर है, और कालाबाजारी से महंगा डीजल खरीदने पर खेती की लागत बढ़ रही है।
आपूर्ति में कमी के मुख्य कारण
जानकारों और पंप संचालकों के अनुसार, इस किल्लत के पीछे कई तकनीकी और आर्थिक कारण हो सकते हैं:
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डिपो से कम सप्लाई: बताया जा रहा है कि मुख्य ऑयल डिपो से मांग के अनुरूप सप्लाई नहीं मिल रही है। तेल कंपनियों द्वारा आपूर्ति में की गई कटौती का असर अब धरातल पर दिख रहा है।
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सीमावर्ती जिलों की विशेष स्थिति: श्रीगंगानगर में पड़ोसी राज्यों (पंजाब और हरियाणा) की तुलना में वैट (VAT) की दरें अधिक होने के कारण अक्सर यहां तेल की कीमतों और उपलब्धता में अस्थिरता रहती है।
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लॉजिस्टिक्स की समस्या: परिवहन के साधनों या टैंकरों की उपलब्धता में कमी भी एक संभावित कारण मानी जा रही है।
दैनिक जीवन और परिवहन पर असर
ईंधन संकट का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं है:
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छात्र और कर्मचारी: स्कूल जाने वाले बच्चों और दफ्तर जाने वाले कर्मचारियों को भारी परेशानी हो रही है। सार्वजनिक परिवहन (बसें और ऑटो) की संख्या भी कम तेल के कारण घट गई है।
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आवश्यक वस्तुएं: दूध, सब्जी और अन्य राशन पहुंचाने वाले छोटे वाहन भी प्रभावित हो रहे हैं, जिससे आने वाले दिनों में महंगाई बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
प्रशासन से समाधान की गुहार
स्थानीय व्यापारिक संगठनों और किसान यूनियनों ने जिला प्रशासन और राज्य सरकार से इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप करने की मांग की है। लोगों का कहना है कि यदि अगले 48 घंटों में आपूर्ति बहाल नहीं की गई, तो वे सड़कों पर उतरने को मजबूर होंगे।
विशेषज्ञ की राय: सीमावर्ती इलाकों में ईंधन की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करना न केवल आर्थिक बल्कि सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये क्षेत्र सामरिक रूप से संवेदनशील होते हैं।
प्रशासन को चाहिए कि वह तेल कंपनियों के साथ समन्वय स्थापित कर आपातकालीन कोटा जारी करे और यह सुनिश्चित करे कि किसी भी प्रकार की जमाखोरी या कालाबाजारी न हो।