
श्रीगंगानगर। राजस्थान का ‘अन्न कटोरा’ कहा जाने वाला श्रीगंगानगर जिला इन दिनों गेहूं की बंपर पैदावार और कटाई के शोर से गूंज रहा है, लेकिन इस चमक के पीछे किसानों का दर्द भी गहराता जा रहा है। सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर गेहूं खरीदने के दावे धरातल पर तकनीकी पेचीदगियों के कारण दम तोड़ते नजर आ रहे हैं। इस समय किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती सरकारी तंत्र की एक नई शर्त बनकर उभरी है— ‘जन आधार’ की अनिवार्यता।
तकनीकी बाधा और पोंग बांध विस्थापितों का दर्द
श्रीगंगानगर जिले में बड़ी संख्या में पोंग बांध विस्थापित किसान बसे हुए हैं। इन किसानों के पास दशकों से जमीनें तो हैं, लेकिन कागजी कार्रवाई और तकनीकी अपडेशन के अभाव में कई किसानों के जन आधार कार्ड या तो बने नहीं हैं, या फिर उनमें दर्ज भूमि का विवरण सरकारी पोर्टल (ई-मित्र/राज-किसान) से मेल नहीं खा रहा है।
नियम के अनुसार, सरकारी खरीद केंद्रों पर पंजीकरण के लिए जन आधार कार्ड का होना अनिवार्य है। पोर्टल पर पंजीकरण करते समय किसान की गिरदावरी और भूमि रिकॉर्ड सीधे जन आधार से लिंक होना चाहिए। समस्या तब आती है जब:
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जन आधार में परिवार के मुखिया का नाम गलत हो।
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भूमि का रिकॉर्ड किसी अन्य सदस्य के नाम पर हो लेकिन जन आधार में वह अपडेट न हो।
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सर्वर डाउन होने या पोर्टल पर डेटा सिंक न होने के कारण पंजीकरण की प्रक्रिया बीच में ही अटक जाती है।
MSP से वंचित किसान और निजी व्यापारियों का मुनाफा
केंद्र सरकार ने इस सीजन के लिए गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) ₹2,275 प्रति क्विंटल (प्लस बोनस की घोषणाओं के साथ) निर्धारित किया है। लेकिन पंजीकरण न हो पाने के कारण किसान सरकारी केंद्रों पर अपनी फसल नहीं ले जा पा रहे हैं।
इस स्थिति का फायदा उठाते हुए निजी व्यापारी और आढ़तिये सक्रिय हो गए हैं। अपनी उपज को ज्यादा दिन तक खुले में रखने या खराब होने के डर से किसान अपनी फसल को निजी मंडियों में ₹2,100 से ₹2,200 प्रति क्विंटल की दर पर बेचने को मजबूर हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि एक औसत किसान को प्रति क्विंटल ₹100 से ₹200 तक का सीधा घाटा हो रहा है। यदि एक किसान 100 क्विंटल गेहूं बेचता है, तो उसे सीधे तौर पर ₹15,000 से ₹20,000 का नुकसान उठाना पड़ रहा है।
मंडियों की जमीनी हकीकत
श्रीगंगानगर की प्रमुख अनाज मंडियों में किसानों की लंबी कतारें देखी जा सकती हैं, लेकिन उनमें से आधे से ज्यादा किसान केवल इस उम्मीद में वहां खड़े हैं कि शायद उनके पोर्टल की समस्या ठीक हो जाए। ई-मित्र केंद्रों पर भीड़ लगी हुई है, जहाँ लोग अपने जन आधार को अपडेट कराने के लिए भटक रहे हैं।
किसान नेताओं का कहना है कि सरकार को खरीद प्रक्रिया को लचीला बनाना चाहिए। उनका तर्क है कि जब किसान के पास वैध गिरदावरी (Girdawari) और पहचान पत्र है, तो केवल एक कार्ड (जन आधार) की तकनीकी गलती के कारण उसे उसके अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया और मांग
जिला प्रशासन का कहना है कि जन आधार की अनिवार्यता भ्रष्टाचार को रोकने और पारदर्शिता लाने के लिए की गई है ताकि सीधा भुगतान किसान के बैंक खाते में हो सके। हालांकि, किसानों की परेशानियों को देखते हुए अब स्थानीय स्तर पर इस प्रक्रिया को सरल बनाने की मांग उठ रही है।
किसानों की मुख्य मांगें:
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वैकल्पिक पहचान: पंजीकरण के लिए केवल जन आधार ही नहीं, बल्कि आधार कार्ड या गिरदावरी को भी आधार बनाया जाए।
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ऑफलाइन पंजीकरण: जिन किसानों का डेटा ऑनलाइन शो नहीं हो रहा, उनका ऑफलाइन रिकॉर्ड लेकर खरीद शुरू की जाए।
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पोर्टल में सुधार: सर्वर की समस्या और पोर्टल की जटिलता को कम किया जाए ताकि अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे किसान भी आसानी से पंजीकरण करवा सकें।
निष्कर्ष
श्रीगंगानगर का किसान पहले ही सिंचाई के पानी की कमी और खाद की किल्लत जैसी समस्याओं से जूझता रहा है। अब जब फसल घर आई है, तो सिस्टम की खामियां उसकी मेहनत की कमाई पर पानी फेर रही हैं। यदि समय रहते ‘जन आधार’ की इस अनिवार्यता में छूट या सुधार नहीं किया गया, तो किसानों का बड़ा हिस्सा एमएसपी के लाभ से वंचित रह जाएगा और उनकी आर्थिक स्थिति और अधिक दयनीय हो जाएगी। सरकार और प्रशासन को चाहिए कि वे तकनीक को सुविधा का जरिया बनाएं, न कि बाधा।