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श्रीगंगानगर: गंग नहर के अस्तित्व पर संकट? नेटिवाला में वेस्ट प्लांट के खिलाफ जन-आंदोलन तेज

प्रस्तावना

राजस्थान के अन्न भंडार कहे जाने वाले श्रीगंगानगर में इन दिनों विकास और पर्यावरण के बीच एक बड़ा संघर्ष छिड़ा हुआ है। नगर परिषद द्वारा नेटिवाला पंचायत क्षेत्र में गंग नहर की मुख्य शाखा के समीप प्रस्तावित ठोस कचरा प्रबंधन (Solid Waste Management) प्लांट का मुद्दा अब एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले चुका है। स्थानीय ग्रामीणों और पर्यावरण प्रेमियों का मानना है कि यह प्रोजेक्ट न केवल क्षेत्र की कृषि को बर्बाद कर देगा, बल्कि लाखों लोगों के पीने के पानी को भी जहरीला बना सकता है।


आंदोलन की मुख्य वजह और ग्रामीणों का आक्रोश

हाल ही में एयरफोर्स के पूर्व अधिकारी और प्रखर पर्यावरण कार्यकर्ता सुनील सिहाग के नेतृत्व में बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने नगर परिषद कार्यालय के बाहर जोरदार प्रदर्शन किया। आंदोलनकारियों का स्पष्ट तर्क है कि जिस स्थान पर प्रशासन कचरा प्लांट लगाने की योजना बना रहा है, वह स्थान गंग नहर की मुख्य धारा के बिल्कुल नजदीक है।

ग्रामीणों के विरोध के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

  1. जल प्रदूषण का खतरा: यदि प्लांट से निकलने वाला दूषित पानी (Leachate) रिसकर नहर में मिल जाता है, तो यह पूरे जिले की पेयजल व्यवस्था को प्रदूषित कर देगा।

  2. कृषि भूमि का विनाश: नेटिवाला और आसपास की भूमि उपजाऊ है। कचरे के ढेरों से निकलने वाली दुर्गंध और रसायनों से आसपास की फसलें बर्बाद होने का डर है।

  3. स्वास्थ्य संकट: कचरा डंपिंग यार्ड से फैलने वाली बीमारियाँ और आवारा पशुओं का जमावड़ा स्थानीय निवासियों के जीवन को नर्क बना देगा।

सुनील सिहाग का पक्ष: ‘नहर हमारी जीवनरेखा है’

आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सुनील सिहाग का कहना है कि प्रशासन नियमों को ताक पर रखकर यह प्रोजेक्ट थोप रहा है। उनके अनुसार, कचरा निस्तारण के लिए शहर से दूर और जल स्रोतों से सुरक्षित दूरी पर जमीन का चयन किया जाना चाहिए था। नहर के किनारे प्लांट बनाना तकनीकी और नैतिक रूप से गलत है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि इस प्रस्ताव को तुरंत वापस नहीं लिया गया, तो वे आगामी दिनों में कलेक्ट्रेट का घेराव करेंगे और अनिश्चितकालीन धरना शुरू करेंगे।


ठोस कचरा प्रबंधन और पर्यावरणीय चिंताएं

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो लैंडफिल या वेस्ट प्लांट का चयन करते समय ‘बफर जोन’ का ध्यान रखा जाना अनिवार्य है। गंग नहर न केवल सिंचाई का साधन है, बल्कि श्रीगंगानगर शहर और गांवों की प्यास बुझाने का मुख्य स्रोत है।

जब भारी मात्रा में कचरा एक जगह जमा किया जाता है, तो बारिश के समय उससे ‘लीचेट’ (Leachate) नामक एक जहरीला तरल निकलता है। यदि यह तरल जमीन में रिसकर भूजल में मिल जाए या सीधे नहर में प्रवाहित हो जाए, तो इसमें मौजूद भारी धातुएं (Heavy Metals) कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकती हैं।

प्रशासन की मजबूरी और विकल्प

दूसरी ओर, नगर परिषद का तर्क है कि शहर के कचरे का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण करना आवश्यक है और इसके लिए उपयुक्त भूमि का मिलना चुनौतीपूर्ण है। हालांकि, जनता के भारी विरोध को देखते हुए अब प्रशासन पर दबाव बढ़ गया है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि सरकार को ‘डिसेंट्रलाइज्ड वेस्ट मैनेजमेंट’ (विकेंद्रीकृत कचरा प्रबंधन) पर ध्यान देना चाहिए, जिसमें कचरे को शहर के बाहर एक ही जगह डंप करने के बजाय वार्ड स्तर पर ही निस्तारित किया जा सके।

निष्कर्ष

नेटिवाला पंचायत का यह संघर्ष केवल एक गांव का नहीं, बल्कि पूरे श्रीगंगानगर की पारिस्थितिकी को बचाने की लड़ाई है। विकास की वेदी पर पर्यावरण और जनता के स्वास्थ्य की बलि नहीं दी जा सकती। प्रशासन को चाहिए कि वह ग्रामीणों के साथ संवाद स्थापित करे और किसी ऐसे वैकल्पिक स्थान का चयन करे जो जल स्रोतों से सुरक्षित दूरी पर हो। यदि समय रहते सही निर्णय नहीं लिया गया, तो यह आंदोलन प्रशासन के लिए बड़ी कानून-व्यवस्था की चुनौती बन सकता है।

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