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श्रीगंगानगर कृषि संकट: खाद की भारी किल्लत और नहरबंदी की दोहरी मार

राजस्थान के सीमावर्ती जिले श्रीगंगानगर में खेती का वर्तमान परिदृश्य गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। जिले के किसान इस समय दोहरी मार झेल रहे हैं: एक तरफ रबी की फसलों के लिए खाद (यूरिया और डीएपी) की भारी किल्लत है, तो दूसरी तरफ सिंचाई विभाग द्वारा प्रस्तावित ‘नहरबंदी’ ने उनकी रातों की नींद उड़ा दी है।


1. खाद की किल्लत: घंटों इंतजार, फिर भी खाली हाथ

श्रीगंगानगर की मंडियों और सहकारी समितियों के बाहर इन दिनों सुबह 4 बजे से ही किसानों की लंबी कतारें देखी जा रही हैं। कड़ाके की ठंड और कोहरे के बीच किसान खाद के टोकन के लिए घंटों इंतजार करते हैं, लेकिन शाम तक कई किसानों को मायूस होकर लौटना पड़ता है।

  • मांग और आपूर्ति में बड़ा अंतर: किसानों का कहना है कि वर्तमान में गेहूं और सरसों की फसल को सिंचाई के साथ खाद की सख्त जरूरत है। जहां एक किसान को औसतन 10 थैलों की आवश्यकता है, वहीं प्रशासन और समितियों द्वारा प्रति किसान केवल 2 से 5 थैले ही दिए जा रहे हैं।

  • कालाबजारी का डर: खाद की इस कमी ने कालाबाजारी की आशंका को भी जन्म दिया है। छोटे और सीमांत किसान सबसे ज्यादा प्रभावित हैं क्योंकि उनके पास स्टॉक रखने की क्षमता नहीं है।


2. नहरबंदी का फैसला: जलते चूल्हे पर पानी

कृषि संकट का दूसरा और सबसे बड़ा कारण आगामी नहरबंदी का फैसला है। सिंचाई विभाग ने रखरखाव के नाम पर नहरों को बंद करने का जो कार्यक्रम घोषित किया है, उसने किसानों के गुस्से को भड़का दिया है।

  • फसलों की बर्बादी का डर: जनवरी और फरवरी का महीना गेहूं की फसल के लिए निर्णायक होता है। इस समय फसल को ‘दाने बनने’ की प्रक्रिया के लिए पर्याप्त पानी चाहिए होता है। यदि इस समय नहरें बंद होती हैं, तो सिंचाई के अभाव में फसलें सूख सकती हैं, जिससे किसानों को प्रति बीघा हजारों रुपये का नुकसान होगा।

  • किसानों का आक्रोश: जिले के विभिन्न क्षेत्रों जैसे पदमपुर, रायसिंहनगर और घड़साना में किसान सड़कों पर उतर आए हैं। भारतीय किसान यूनियन और अन्य स्थानीय संगठनों ने कलेक्ट्रेट के सामने धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया है। उनकी मांग स्पष्ट है: “जब तक फसल पक नहीं जाती, नहरबंदी का फैसला टाला जाए।”


3. आर्थिक और मानसिक दबाव

श्रीगंगानगर का पूरा अर्थशास्त्र खेती पर टिका है। खाद की कमी और पानी का संकट न केवल फसल की पैदावार कम करेगा, बल्कि किसानों को कर्ज के जाल में भी धकेल सकता है। कड़ाके की ठंड में सड़कों पर प्रदर्शन करना किसानों की मजबूरी बन गया है। किसानों का तर्क है कि एक तरफ सरकार ‘अन्नदाता’ के कल्याण की बातें करती है, वहीं दूसरी तरफ बुनियादी सुविधाएं (खाद और पानी) समय पर उपलब्ध नहीं कराई जा रही हैं।


4. प्रशासन का रुख और समाधान की उम्मीद

जिला प्रशासन का दावा है कि खाद की रैक (Rake) जल्द ही जिले में पहुंचने वाली है और वितरण व्यवस्था को सुधारा जा रहा है। वहीं, नहरबंदी के मुद्दे पर प्रशासन का कहना है कि नहरों की मरम्मत भी तकनीकी रूप से अनिवार्य है ताकि भविष्य में कोई बड़ा हादसा न हो। हालांकि, किसान इस दलील से संतुष्ट नहीं हैं और आंदोलन को तेज करने की चेतावनी दे रहे हैं।

निष्कर्ष: श्रीगंगानगर के किसानों के लिए 18 जनवरी का यह समय अग्निपरीक्षा जैसा है। यदि प्रशासन ने समय रहते खाद की आपूर्ति सुनिश्चित नहीं की और नहरबंदी के कार्यक्रम में बदलाव नहीं किया, तो इस साल जिले में रबी की पैदावार में 30% से 40% तक की गिरावट आ सकती है।

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