
रायसिंहनगर/श्रीगंगानगर: अक्सर कहा जाता है कि कला अभावों में ही पनपती है। यह बात रायसिंहनगर के पवन छड़िया पर बिल्कुल सटीक बैठती है। पवन कोई प्रशिक्षित मूर्तिकार नहीं हैं, न ही उन्होंने किसी बड़े आर्ट कॉलेज से डिग्री ली है, लेकिन जब वे हाथ में छेनी और हथौड़ी उठाते हैं, तो लकड़ी का एक निर्जीव टुकड़ा भी बोलने लगता है।
1. संघर्षों की आंच में निखरा हुनर
पवन का जीवन कभी आसान नहीं रहा। गांव 71 NP के एक साधारण परिवार में जन्मे पवन ने बचपन से ही आर्थिक तंगी का सामना किया। घर की जिम्मेदारियों और सीमित संसाधनों के कारण उनके सामने कई चुनौतियां थीं, लेकिन उनके भीतर एक कलाकार हमेशा जीवित रहा। पवन बताते हैं कि जब लोग सूखी लकड़ियों को जलावन के काम में लेते थे, उन्हें उन लकड़ियों के टेढ़े-मेढ़े आकार में आकृतियां नज़र आती थीं। इसी सोच ने उन्हें “वुड कार्विंग” की ओर प्रेरित किया।
2. कलाकृति: लकड़ी पर उकेरा गया इतिहास और आस्था
पवन की कला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे बेकार समझी जाने वाली पुरानी या सूखी लकड़ियों का उपयोग करते हैं। उनकी कृतियों में मुख्य रूप से शामिल हैं:
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देवी-देवताओं की मूर्तियां: पवन ने भगवान गणेश, शिव और माता दुर्गा की ऐसी बारीक आकृतियां उकेरी हैं कि देखने वाले दंग रह जाते हैं।
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महापुरुषों के चित्र: उन्होंने शहीद भगत सिंह, बाबा साहेब अंबेडकर और महाराणा प्रताप जैसी विभूतियों के जीवंत पोर्ट्रेट लकड़ी पर तैयार किए हैं।
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बारीकी का कमाल: लकड़ी के रेशों को बिना नुकसान पहुँचाए, चेहरे के हाव-भाव और कपड़ों की सिलवटों को इतनी बारीकी से उकेरना पवन की विशेषज्ञता है।
3. बिना किसी आधुनिक मशीन के काम
आज के दौर में जहां मशीनों (Laser Cutting) से नक्काशी की जाती है, वहीं पवन आज भी अपने हाथों से बनाए गए औजारों और साधारण छेनी-हथौड़ी का उपयोग करते हैं। उनकी कला की यही “मौलिकता” (Originality) उन्हें दूसरों से अलग बनाती है। उनके द्वारा बनाई गई एक-एक मूर्ति को तैयार करने में कई दिनों की कड़ी मेहनत और एकाग्रता लगती है।
4. जिले भर में सराहना और मांग
सोशल मीडिया के माध्यम से जब पवन की कलाकृतियों की तस्वीरें साझा हुईं, तो श्रीगंगानगर ही नहीं बल्कि पड़ोसी जिलों से भी लोग उनकी कला देखने पहुंचने लगे। लोग अब उन्हें विशेष उपहार (Customized Gifts) और स्मृति चिन्ह बनाने के ऑर्डर भी दे रहे हैं। स्थानीय जनप्रतिनिधियों और कला प्रेमियों ने सरकार से मांग की है कि पवन जैसे जमीनी कलाकारों को उचित मंच और सरकारी सहायता प्रदान की जाए ताकि इस विलुप्त होती कला को बचाया जा सके।
निष्कर्ष: प्रेरणा का स्रोत
पवन छड़िया की कहानी हमें सिखाती है कि यदि इरादे मजबूत हों, तो गरीबी और विपरीत परिस्थितियां आपके सपनों की राह में बाधा नहीं बन सकतीं। आज पवन न केवल अपने गांव का नाम रोशन कर रहे हैं, बल्कि उन युवाओं के लिए भी प्रेरणा हैं जो संसाधनों की कमी का बहाना बनाकर हार मान लेते हैं।
पवन का सपना है कि वे एक दिन अपनी कला की प्रदर्शनी बड़े शहरों में लगाएं और आने वाली पीढ़ी को लकड़ी की नक्काशी की यह प्राचीन विधा सिखा सकें।