🢀
डिजिटल इंडिया के दावों की हवा निकालता वायरल वीडियो: श्रीगंगानगर के सरकारी स्कूल की कड़वी सच्चाई

श्रीगंगानगर: आज के दौर में जहाँ एक ओर हम ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘स्मार्ट क्लासरूम’ का जश्न मना रहे हैं, वहीं राजस्थान के सीमावर्ती जिले श्रीगंगानगर से आई एक वायरल वीडियो ने शिक्षा व्यवस्था के खोखलेपन को उजागर कर दिया है। सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसारित हो रहे इस वीडियो ने न केवल अभिभावकों को चिंता में डाल दिया है, बल्कि शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं।

क्या है वायरल वीडियो में?

वायरल हो रहा यह वीडियो श्रीगंगानगर जिले के एक ग्रामीण क्षेत्र के सरकारी स्कूल का बताया जा रहा है। वीडियो में देखा जा सकता है कि स्कूल की दीवारों पर रंग-रोपण और स्मार्ट क्लास के बोर्ड तो लगे हैं, लेकिन जब कक्षा के छात्रों से शिक्षा के बुनियादी सवाल पूछे गए, तो हकीकत कुछ और ही निकली।

वीडियो बना रहा व्यक्ति (जो संभवतः एक जागरूक नागरिक या स्थानीय पत्रकार है) कक्षा 5वीं और 6ठी के छात्रों से साधारण जोड़-घटाव (Addition & Subtraction) के सवाल पूछता है। चौंकाने वाली बात यह है कि छात्र $15 + 27$ जैसे सरल सवालों को हल करने में भी असमर्थ नजर आए। कुछ बच्चे ब्लैकबोर्ड पर लिखे अंकों को पहचान तक नहीं पा रहे थे। यह स्थिति तब है जब सरकार ‘निपुण भारत’ जैसे अभियानों के तहत बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान (FLN) पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है।

स्मार्ट क्लास बनाम ‘स्मार्ट’ छात्र

वीडियो में एक तरफ आधुनिक एलइडी (LED) स्क्रीन और कंप्यूटर सेट दिखाई दे रहे हैं, जिन्हें ‘डिजिटल लर्निंग’ का आधार बताया जाता है। लेकिन विडंबना यह है कि उन डिजिटल उपकरणों का उपयोग करने वाले छात्र अक्षर ज्ञान और बुनियादी गणित में पिछड़े हुए हैं। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि केवल संसाधन जुटाने से शिक्षा का स्तर नहीं सुधरता; जब तक उन संसाधनों का सही उपयोग और जमीनी स्तर पर प्रभावी शिक्षण न हो।

सोशल मीडिया पर लोग इस वीडियो को साझा करते हुए लिख रहे हैं, “मशीनें तो स्मार्ट हो गईं, लेकिन हमारे बच्चों का भविष्य अंधकार में है।”

स्थानीय शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल

इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) कार्यालय और ब्लॉक स्तर के अधिकारियों की कार्यशैली पर उंगलियां उठ रही हैं। जनता के बीच मुख्य रूप से ये सवाल गूँज रहे हैं:

  1. निरीक्षण की खानापूर्ति: क्या शिक्षा विभाग के अधिकारी नियमित रूप से स्कूलों का दौरा करते हैं? यदि हाँ, तो क्या वे केवल कागजों पर ‘सब ठीक है’ लिखकर लौट आते हैं?

  2. शिक्षकों की जवाबदेही: सरकारी शिक्षकों को मिलने वाले भारी-भरकम वेतन के बावजूद बच्चों का शैक्षणिक स्तर इतना दयनीय क्यों है? क्या शिक्षण से इतर कार्यों (गैर-शैक्षणिक कार्यों) का बोझ शिक्षकों पर ज्यादा है?

  3. बजट का सदुपयोग: स्मार्ट क्लास के नाम पर खरीदे गए उपकरणों का रखरखाव और उनके माध्यम से पढ़ाई हो रही है या वे केवल धूल फांक रहे हैं?

अभिभावकों में रोष और निराशा

श्रीगंगानगर के स्थानीय निवासियों का कहना है कि वे अपने बच्चों को इस उम्मीद में सरकारी स्कूल भेजते हैं कि वहां उन्हें योग्य और प्रशिक्षित शिक्षक मिलेंगे। लेकिन इस तरह के वीडियो सामने आने के बाद उनका भरोसा डगमगा गया है। एक स्थानीय अभिभावक ने कहा, “हम प्राइवेट स्कूल की फीस नहीं भर सकते, इसलिए सरकारी स्कूल पर निर्भर हैं। अगर यहाँ बच्चा जोड़-बाकी भी नहीं सीखेगा, तो वह कल को क्या बनेगा?”

विभाग की सफाई और आगामी कार्रवाई

वीडियो वायरल होने और मीडिया में मामला उछलने के बाद, जिला प्रशासन ने आनन-फानन में जांच के आदेश दिए हैं। स्थानीय शिक्षा अधिकारियों का कहना है कि वीडियो की सत्यता की जांच की जा रही है और संबंधित स्कूल के प्रधानाध्यापक व विषय अध्यापकों से स्पष्टीकरण मांगा गया है। विभाग ने दावा किया है कि ‘लर्निंग गैप’ को भरने के लिए विशेष कार्ययोजना बनाई जाएगी।

निष्कर्ष

श्रीगंगानगर का यह वायरल वीडियो केवल एक स्कूल की कहानी नहीं, बल्कि राज्य के कई सरकारी स्कूलों की एक कड़वी हकीकत हो सकती है। ‘डिजिटल इंडिया’ तभी सफल होगा जब हमारे बच्चों के पास डिजिटल साक्षरता से पहले मजबूत बुनियादी शिक्षा होगी। प्रशासन को केवल जांच का आश्वासन देने के बजाय, शिक्षकों की जवाबदेही तय करने और कक्षा में शिक्षण की गुणवत्ता सुधारने पर कठोर कदम उठाने की आवश्यकता है।

शिक्षा व्यवस्था को केवल ‘स्मार्ट’ दिखने की नहीं, बल्कि वास्तव में ‘सक्षम’ होने की जरूरत है।

©️ श्री गंगानगर न्यूज़ ©️