🢀
ग्रामीण विकास की जमीनी हकीकत: श्रीगंगानगर की ग्राम पंचायतों में स्वच्छता अभियान ‘कागजों’ पर, धरातल पर नारकीय स्थिति

श्रीगंगानगर। केंद्र और राज्य सरकार की ओर से ग्रामीण इलाकों के कायाकल्प और ‘स्वच्छ भारत मिशन’ के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये का बजट पानी की तरह बहाया जा रहा है। लेकिन राजस्थान के सरहदी जिले श्रीगंगानगर की कई ग्राम पंचायतों से जो तस्वीरें और रिपोर्ट सामने आ रही हैं, वे इन दावों की पोल खोलने के लिए काफी हैं। आज, 17 अप्रैल 2026 को जिले के विभिन्न ब्लॉक से ग्रामीणों ने प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए सफाई व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

1. नारकीय जीवन जीने को मजबूर ग्रामीण

जिले की कई बड़ी ग्राम पंचायतों में हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि मुख्य रास्तों पर गंदा पानी जमा है। नालियां पूरी तरह जाम हो चुकी हैं, जिसके कारण घरों से निकलने वाला गंदा पानी गलियों में इकट्ठा हो रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि पिछले कई महीनों से नालियों की सफाई नहीं हुई है। गर्मी बढ़ने के साथ ही इस ठहरे हुए पानी से उठने वाली दुर्गंध ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया है। मच्छरों के पनपने से क्षेत्र में मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियों का खतरा भी मंडराने लगा है।

2. कागजों में ‘चकाचक’, हकीकत में कचरे के ढेर

हैरानी की बात यह है कि पंचायती राज विभाग के रिकॉर्ड में इन पंचायतों को ‘स्वच्छ’ और ‘ओडीएफ प्लस’ (ODF+) श्रेणियों में दर्शाया जा रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, नियमित रूप से कचरा संग्रहण और नालियों की सफाई का काम जारी है। लेकिन जब धरातल पर जाकर देखा जाता है, तो गांव के प्रवेश द्वारों पर ही कचरे के बड़े-बड़े ढेर नजर आते हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि सफाई कर्मचारियों की नियुक्ति तो है, लेकिन वे गांवों में काम करने के बजाय केवल हाजिरी रजिस्टर तक सीमित हैं। कूड़ादान (Dustbins) जो लाखों की लागत से लगवाए गए थे, वे या तो टूट चुके हैं या चोरी हो गए हैं। कचरा प्रबंधन केंद्रों (RRCs) की हालत भी जर्जर है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि स्वच्छता केवल कागजों तक ही सीमित रह गई है।

3. बजट का ‘मायाजाल’ और भ्रष्टाचार के आरोप

ग्रामीण विकास के लिए आने वाले बजट का सदुपयोग न होना स्थानीय स्तर पर विरोध का सबसे बड़ा कारण है। विकास शुल्क और केंद्र सरकार से मिलने वाली ग्रांट का पैसा आखिर जा कहाँ रहा है? यह सवाल आज हर ग्रामीण पूछ रहा है। ग्रामीणों का सीधा आरोप ग्राम विकास अधिकारियों (VDO) और सरपंचों पर है। उनका कहना है कि सफाई के नाम पर फर्जी बिल पास किए जा रहे हैं, जबकि हकीकत में एक भी सफाई कर्मी गांव की गलियों में नजर नहीं आता।

4. स्थानीय विरोध और प्रशासन की चुप्पी

आज श्रीगंगानगर के पदमपुर, रायसिंहनगर और सूरतगढ़ ब्लॉक की कई पंचायतों में ग्रामीणों ने प्रदर्शन किया। ग्रामीणों ने जिला कलेक्टर और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) के नाम ज्ञापन सौंपकर मांग की है कि सफाई व्यवस्था की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए। विरोध कर रहे युवाओं का कहना है कि यदि अगले सात दिनों के भीतर नालियों की सफाई और कचरा निस्तारण का काम शुरू नहीं हुआ, तो वे पंचायत मुख्यालयों पर तालाबंदी करेंगे।

5. क्या है समाधान?

विशेषज्ञों और जागरूक नागरिकों का मानना है कि इस समस्या का समाधान केवल बजट जारी करने से नहीं होगा। इसके लिए निम्नलिखित कदम उठाने अनिवार्य हैं:

  • डिजिटल मॉनिटरिंग: सफाई कर्मियों की उपस्थिति और सफाई कार्य की फोटो ‘जियो-टैगिंग’ के साथ अनिवार्य की जाए।

  • जनभागीदारी: वार्ड स्तर पर स्वच्छता कमेटियां बनाई जाएं, जिनमें स्थानीय लोगों को शामिल किया जाए ताकि वे काम की निगरानी कर सकें।

  • सोशल ऑडिट: पंचायतों के खर्चों का विवरण सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शित किया जाए ताकि पारदर्शिता बनी रहे।

निष्कर्ष: स्वच्छता केवल एक नारा नहीं बल्कि बुनियादी अधिकार है। श्रीगंगानगर के ग्रामीण अंचलों की यह स्थिति पंचायती राज व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर एक गहरा धब्बा है। यदि समय रहते ‘कागजी घोड़ों’ को रोककर धरातल पर काम नहीं किया गया, तो आने वाले मानसून में स्थिति और भी भयावह हो सकती है। प्रशासन को चाहिए कि वह केवल सख्ती के आदेश न निकाले, बल्कि मौके पर जाकर जमीनी हकीकत का मुआयना भी करे।

©️ श्री गंगानगर न्यूज़ ©️