
श्रीगंगानगर, जिसे “राजस्थान का अन्न कटोरा” कहा जाता है, इस समय एक बड़े कृषि संकट की दहलीज पर खड़ा है। गंगनहर प्रणाली में जनवरी माह में प्रस्तावित नहरबंदी (Canal Closure) के फैसले ने जिले के हजारों किसानों की चिंता बढ़ा दी है। सिंचाई पानी की कटौती के विरोध में किसान संगठनों ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है और 12 जनवरी 2026 को जिला कलेक्ट्रेट के घेराव और अनिश्चितकालीन महापड़ाव का ऐलान किया है।
विवाद की मुख्य जड़: रबी की फसल और पानी की जरूरत
जनवरी का महीना रबी की फसलों, विशेषकर गेहूं, सरसों और चने के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है। इस समय फसलों को ‘कोरवाण’ (पहली सिंचाई) और उसके बाद की महत्वपूर्ण सिंचाइयों की आवश्यकता होती है।
किसान नेताओं का तर्क है कि यदि इस समय नहरों को बंद किया गया, तो:
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फसलों की बर्बादी: पानी के अभाव में गेहूं की बालियां समय से पहले सूख सकती हैं, जिससे पैदावार में भारी गिरावट आएगी।
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आर्थिक नुकसान: किसान पहले ही खाद और बीज पर भारी निवेश कर चुका है। नहरबंदी सीधे तौर पर किसान की आर्थिक कमर तोड़ देगी।
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पीने के पानी का संकट: नहरबंदी से केवल सिंचाई ही नहीं, बल्कि जिले के कस्बों और गांवों में पीने के पानी का भंडारण भी प्रभावित होगा।
किसान संगठनों की रणनीति और महापड़ाव
विभिन्न किसान यूनियनों और गंगनहर संघर्ष समिति ने इस मुद्दे पर एकजुट होकर प्रशासन को अल्टीमेटम दिया है। किसान नेताओं का कहना है कि प्रशासन और जल संसाधन विभाग बिना जमीनी हकीकत जाने नहरबंदी का फैसला थोप रहे हैं।
आंदोलन की मुख्य रूपरेखा:
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कलेक्ट्रेट घेराव: 12 जनवरी को जिले भर से हजारों की संख्या में किसान ट्रैक्टर-ट्रॉली के साथ श्रीगंगानगर पहुंचेंगे।
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महापड़ाव: किसानों ने चेतावनी दी है कि जब तक नहरबंदी का फैसला वापस नहीं लिया जाता या सिंचाई का वैकल्पिक चार्ट जारी नहीं होता, वे कलेक्ट्रेट के सामने से नहीं हटेंगे।
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गांव-गांव जनसंपर्क: आंदोलन को सफल बनाने के लिए पदमपुर, रायसिंहनगर, श्रीकरणपुर और घड़साना जैसे क्षेत्रों में लगातार बैठकें की जा रही हैं।
प्रशासन और जल संसाधन विभाग का पक्ष
दूसरी ओर, विभाग का तर्क है कि नहरों की मरम्मत और लाइनिंग (नहर को पक्का करना) के लिए नहरबंदी आवश्यक है। विभाग के अनुसार, यदि समय रहते मरम्मत नहीं की गई, तो भविष्य में नहर टूटने का खतरा बढ़ सकता है, जिससे और भी बड़ा नुकसान होने की संभावना है। हालांकि, किसान इस तर्क को मानने को तैयार नहीं हैं; उनका कहना है कि मरम्मत का कार्य फसल कटाई के बाद गर्मी के मौसम में किया जाना चाहिए।
आगे की राह: क्या निकलेगा समाधान?
श्रीगंगानगर का इतिहास गवाह है कि यहाँ के किसान पानी के हक के लिए लंबे समय तक संघर्ष करने की क्षमता रखते हैं। 2004 का घड़साना आंदोलन इसका प्रमुख उदाहरण है। वर्तमान में कड़ाके की ठंड और शीतलहर के बीच किसानों का सड़कों पर उतरना प्रशासन के लिए बड़ी कानून-व्यवस्था की चुनौती पेश कर सकता है।
यदि आने वाले दो-तीन दिनों में सरकार और किसान प्रतिनिधियों के बीच कोई ठोस वार्ता सफल नहीं होती, तो 12 जनवरी को श्रीगंगानगर में भारी विरोध प्रदर्शन देखने को मिल सकता है।