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‘खेजड़ी बचाओ’ आंदोलन: श्रीगंगानगर में गूंजी प्रकृति संरक्षण की हुंकार

पश्चिमी राजस्थान की मरुस्थलीय संस्कृति और पारिस्थितिकी (Ecology) का आधार स्तंभ माना जाने वाला ‘खेजड़ी’ वृक्ष आज एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। 2 फरवरी, 2026 को बीकानेर में आयोजित विशाल ‘महापड़ाव’ और बंद के आह्वान ने न केवल मारवाड़, बल्कि जांगल प्रदेश और श्रीगंगानगर जैसे जिलों में भी एक नई चेतना जागृत की है। ‘खेजड़ी बचाओ, प्रकृति बचाओ’ आंदोलन की लहर अब श्रीगंगानगर के गांवों और शहरों तक पहुँच चुकी है, जहाँ पर्यावरण प्रेमियों और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने इस मुहिम को अपना पूर्ण समर्थन देने की घोषणा की है।


खेजड़ी: मरुस्थल का ‘कल्पवृक्ष’ और उसकी अहमियत

खेजड़ी (Prosopis cineraria) केवल एक पेड़ नहीं है, बल्कि यह राजस्थान की जीवनरेखा है। इसे राजस्थान का ‘राज्य वृक्ष’ होने का गौरव प्राप्त है।

  • अकाल का सहारा: भीषण अकाल के समय भी यह वृक्ष हरा-भरा रहता है, जिससे पशुओं को चारा (लूंग) और मनुष्यों को सांगरी (सब्जी) प्राप्त होती है।

  • मिट्टी का रक्षक: इसकी जड़ें नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation) के माध्यम से मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती हैं और मरुस्थलीकरण (Desertification) को रोकने में मदद करती हैं।


आंदोलन का मुख्य कारण: सौर ऊर्जा और विकास की बलि?

हाल के वर्षों में पश्चिमी राजस्थान में बड़े पैमाने पर सोलर प्लांट और ग्रीन एनर्जी प्रोजेक्ट्स लगाए जा रहे हैं। हालांकि यह ऊर्जा क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन इन प्रोजेक्ट्स के लिए हजारों की संख्या में खेजड़ी के पेड़ों को काटा जा रहा है। इसी के विरोध में बिश्नोई समाज और अन्य पर्यावरण प्रेमी संगठनों ने मोर्चा खोल दिया है।

आंदोलनकारियों की मुख्य मांगें हैं:

  1. खेजड़ी कटाई पर पूर्ण प्रतिबंध: किसी भी विकास परियोजना के लिए खेजड़ी के पुराने पेड़ों को काटने के बजाय प्रोजेक्ट के डिजाइन में बदलाव किया जाए।

  2. पर्यावरण कानून का सख्त पालन: पेड़ों की अवैध कटाई करने वाली कंपनियों पर भारी जुर्माना और कानूनी कार्रवाई हो।

  3. नया पौधरोपण: जहां पेड़ काटना अनिवार्य हो, वहां एक के बदले दस नए खेजड़ी के पौधे लगाने और उनकी 5 साल तक देखभाल की जिम्मेदारी तय हो।


श्रीगंगानगर में एकजुटता और प्रदर्शन की तैयारी

2 फरवरी को बीकानेर में प्रस्तावित महापड़ाव के समर्थन में श्रीगंगानगर जिले में भी व्यापक तैयारियां की गई हैं।

  • जागरूकता रैलियां: जिले के विभिन्न सरकारी और निजी स्कूलों के विद्यार्थियों, एनजीओ और ‘नेचर क्लब्स’ ने जागरूकता रैलियां निकालने की योजना बनाई है। इनका उद्देश्य आम जनता को खेजड़ी के ऐतिहासिक महत्व (विशेषकर 1730 का खेजड़ली बलिदान) से अवगत कराना है।

  • संगठनों का समर्थन: श्रीगंगानगर के किसान संगठनों और व्यापार मंडलों ने भी इस आंदोलन को नैतिक समर्थन दिया है। उनका तर्क है कि यदि पर्यावरण का संतुलन बिगड़ा, तो खेती-बाड़ी पर भी इसका सीधा नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

  • सोशल मीडिया अभियान: जिले के युवाओं ने ‘SaveKhejri’ और ‘GreenGanganagar’ जैसे हैशटैग के माध्यम से डिजिटल विरोध प्रदर्शन शुरू किया है, जो तेजी से वायरल हो रहा है।


ऐतिहासिक विरासत और हमारी जिम्मेदारी

राजस्थान का इतिहास पेड़ों की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने का रहा है। अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 लोगों का बलिदान आज भी दुनिया भर के पर्यावरण प्रेमियों के लिए प्रेरणा स्रोत है। श्रीगंगानगर, जो अपनी हरियाली और नहरों के लिए जाना जाता है, इस आंदोलन के माध्यम से यह संदेश दे रहा है कि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन अनिवार्य है।

निष्कर्ष

‘खेजड़ी बचाओ’ आंदोलन केवल एक वृक्ष को बचाने की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित और हरा-भरा भविष्य सुनिश्चित करने का संकल्प है। श्रीगंगानगर में इस आंदोलन को मिल रहा समर्थन यह दर्शाता है कि अब लोग केवल आर्थिक विकास ही नहीं, बल्कि पारिस्थितिक सुरक्षा (Ecological Security) की भी मांग कर रहे हैं। यदि सरकार और प्रशासन समय रहते इन मांगों पर ध्यान नहीं देते, तो यह आंदोलन और भी उग्र रूप ले सकता है।

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