🢀
किसान-मजदूरों की बुलंद आवाज का खामोश होना: कॉमरेड हेतराम बेनीवाल का अवसान

श्रीगंगानगर। राजस्थान की राजनीति और किसान आंदोलनों के एक स्वर्णिम अध्याय का आज अंत हो गया। प्रदेश के कद्दावर वामपंथी नेता, पूर्व विधायक और ‘किसानों के मसीहा’ कहे जाने वाले कॉमरेड हेतराम बेनीवाल ने 94 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली। सोमवार देर रात श्रीगंगानगर के एक निजी अस्पताल में उपचार के दौरान उनका निधन हुआ। वे पिछले कुछ समय से उम्र संबंधी बीमारियों से जूझ रहे थे। उनके निधन की खबर फैलते ही पूरे मारवाड़ और शेखावाटी सहित विशेषकर उत्तर राजस्थान (श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़) में शोक की लहर दौड़ गई है।


एक युग का अंत: जीवन परिचय

हेतराम बेनीवाल का जन्म श्रीगंगानगर जिले के एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। मिट्टी से जुड़े होने के कारण उन्होंने बचपन से ही किसानों और खेतिहर मजदूरों के संघर्ष को करीब से देखा था। उन्होंने छात्र जीवन से ही राजनीति में कदम रखा और मार्क्सवादी विचारधारा को अपनाते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी CPIM के साथ जुड़ गए।

उनकी सादगी और निस्वार्थ सेवा भाव ने उन्हें जनता के बीच अत्यंत लोकप्रिय बना दिया। उन्होंने संगरिया विधानसभा क्षेत्र से राजस्थान विधानसभा में प्रतिनिधित्व किया और सदन में हमेशा दबे-कुचले वर्गों की आवाज बुलंद की।

घड़साना किसान आंदोलन के महानायक

जब भी राजस्थान के किसान आंदोलनों का इतिहास लिखा जाएगा, उसमें हेतराम बेनीवाल का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित होगा। साल 2004-05 में सिंचाई पानी की मांग को लेकर हुआ घड़साना किसान आंदोलन उनके नेतृत्व की सबसे बड़ी परीक्षा और सफलता थी।

  • पानी के लिए संघर्ष: तत्कालीन सरकार के खिलाफ जब किसानों ने सिंचाई पानी के हक के लिए आवाज उठाई, तो बेनीवाल ने लाठियों और गोलियों की परवाह किए बिना सड़कों पर मोर्चा संभाला।

  • दमन के खिलाफ खड़े होना: इस आंदोलन के दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा और पुलिसिया दमन का सामना करना पड़ा, लेकिन वे टस से मस नहीं हुए। अंततः सरकार को किसानों की मांगों के आगे झुकना पड़ा।

मजदूरों और शोषितों के रक्षक

बेनीवाल केवल किसानों तक ही सीमित नहीं थे। उन्होंने ईंट-भट्टा मजदूरों, दिहाड़ी कामगारों और भूमिहीनों के अधिकारों के लिए भी दशकों तक संघर्ष किया। उनका मानना था कि जब तक समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को आर्थिक और सामाजिक न्याय नहीं मिलता, तब तक लोकतंत्र अधूरा है। उन्होंने ‘खेत कमावे सो खावे’ (जो खेत में मेहनत करेगा, वही खाएगा) के नारे को हकीकत में बदलने के लिए जीवन भर काम किया।

सादगी की मिसाल

आज की चकाचौंध वाली राजनीति में हेतराम बेनीवाल एक अपवाद थे। विधायक रहने के बावजूद उन्होंने कभी वीआईपी संस्कृति को नहीं अपनाया। वे अपनी पुरानी साइकिल या पैदल चलकर ही लोगों की समस्याएं सुनने निकल जाते थे। उनका घर (8 LNP) हमेशा कार्यकर्ताओं और पीड़ितों के लिए खुला रहता था। उनके पास कोई बड़ी संपत्ति नहीं थी, उनकी असली संपत्ति वह जनसमूह था जो उनकी एक आवाज पर उमड़ पड़ता था।

अंतिम विदाई

आज उनके पैतृक गांव 8 LNP में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। उनके निधन पर विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और किसान संगठनों ने गहरा शोक व्यक्त किया है। नेताओं ने उन्हें एक ऐसा ‘वटवृक्ष’ बताया है जिसकी छाया में राजस्थान के कई युवा नेताओं ने राजनीति के गुर सीखे।

निष्कर्ष

कॉमरेड हेतराम बेनीवाल का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि उस जुझारू राजनीति के दौर का अंत है जो केवल मूल्यों और मुद्दों पर आधारित थी। वे भले ही आज हमारे बीच शारीरिक रूप से मौजूद नहीं हैं, लेकिन राजस्थान की नहरों में बहता पानी और खेतों में लहलहाती फसलें हमेशा उनके संघर्ष की याद दिलाती रहेंगी।

©️ श्री गंगानगर न्यूज़ ©️