
वैश्विक कार्यबल (Global Workforce) के बीच ‘बर्नआउट’ (Burnout) की समस्या अब एक गंभीर महामारी का रूप ले चुकी है। काम के अत्यधिक बोझ (Workload), लगातार तनाव और काम तथा निजी जीवन के बीच संतुलन की कमी के कारण होने वाली इस स्थिति को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने एक आधिकारिक चेतावनी जारी की है। WHO ने बर्नआउट को एक ‘क्रॉनिक स्ट्रेस’ (Chronic Stress) की स्थिति बताया है, जो धीरे-धीरे विकसित होती है और जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
क्या है ‘बर्नआउट’ और इसके लक्षण?
‘बर्नआउट’ एक मेडिकल कंडीशन नहीं है, बल्कि यह कामकाज के संदर्भ में उपजे तनाव से उत्पन्न एक सिंड्रोम है। WHO ने इसे मुख्य रूप से तीन आयामों में परिभाषित किया है:
- ऊर्जा की कमी या थकावट (Energy Depletion or Exhaustion): कर्मचारी लगातार शारीरिक और मानसिक रूप से थका हुआ महसूस करता है।
- काम से अलगाव की भावना (Increased Mental Distance from One’s Job): काम के प्रति नकारात्मकता, निराशा और उदासीनता महसूस करना।
- घटी हुई व्यावसायिक दक्षता (Reduced Professional Efficacy): काम में कम उत्पादकता और अपने प्रदर्शन को लेकर असंतुष्टि महसूस करना।
भारत में, यह आँकड़ा वैश्विक औसत से भी ज़्यादा चिंताजनक है, खासकर आईटी, स्वास्थ्य सेवा और स्टार्टअप क्षेत्रों में, जहाँ काम के घंटे अनिश्चित होते हैं और अपेक्षाएँ अत्यधिक होती हैं।
बर्नआउट के गंभीर परिणाम
बर्नआउट का प्रभाव केवल कार्यस्थल तक ही सीमित नहीं रहता; यह कर्मचारी के संपूर्ण जीवन को प्रभावित करता है:
- स्वास्थ्य पर प्रभाव: बर्नआउट से पीड़ित व्यक्ति अक्सर अनिद्रा (Insomnia), सिरदर्द, पेट की समस्याओं, कमजोर इम्यूनिटी और हृदय रोगों के बढ़ते जोखिम का शिकार हो जाते हैं।
- प्रदर्शन में गिरावट: लगातार तनाव के कारण एकाग्रता (Concentration) कम होती है, निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है और गलतियाँ बढ़ने लगती हैं, जिससे कंपनी की उत्पादकता को नुकसान होता है।
- रिश्तों में तनाव: निजी जीवन और रिश्तों में चिड़चिड़ापन, गुस्सा और अलगाव आने लगता है, जिससे सामाजिक और पारिवारिक जीवन प्रभावित होता है।
एक्सपर्ट्स की सलाह: समाधान क्या है?
विशेषज्ञों का कहना है कि बर्नआउट को रोकने और उसका प्रबंधन करने के लिए कंपनियों और कर्मचारियों दोनों को सक्रिय कदम उठाने होंगे:
- स्पष्ट सीमाएँ तय करना (Setting Clear Boundaries): कंपनियों को वर्क-लाइफ बैलेंस के लिए स्पष्ट नीतियाँ बनानी चाहिए। कर्मचारियों को काम के घंटों के बाद ईमेल या कॉल का जवाब न देने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
- मानसिक स्वास्थ्य सहायता (Psychological Support): कार्यस्थल पर मानसिक स्वास्थ्य परामर्श (Counselling) और सहायता सेवाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए। कर्मचारियों को बिना किसी डर के मदद मांगने के लिए एक सुरक्षित वातावरण प्रदान किया जाना चाहिए।
- माइक्रो-ब्रेक्स और लचीलापन: कर्मचारियों को दिन के दौरान छोटे-छोटे ब्रेक लेने और जहाँ संभव हो वहाँ लचीले कामकाजी घंटे (Flexible Working Hours) अपनाने की अनुमति देनी चाहिए।
- ट्रेनिंग और जागरूकता: प्रबंधन को तनाव प्रबंधन और बर्नआउट के लक्षणों को पहचानने के लिए नियमित रूप से जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने चाहिए।
बर्नआउट एक व्यक्तिगत विफलता नहीं है, बल्कि यह एक सांगठनिक समस्या है जिसे मिलकर हल करने की आवश्यकता है, ताकि एक स्वस्थ और टिकाऊ कार्य संस्कृति का निर्माण किया जा सके।