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🔬 विज्ञान का चमत्कार: आईआईटी मद्रास की ‘बिना सुई’ वाली ग्लूकोज़ मॉनिटरिंग तकनीक

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान आईआईटी मद्रास (IIT Madras) के वैज्ञानिकों ने मधुमेह (Diabetes) प्रबंधन की दिशा में एक क्रांतिकारी खोज की है। उन्होंने एक ऐसी दर्द रहित (Non-invasive) और गैर-आक्रामक तकनीक विकसित की है, जिसके माध्यम से अब मधुमेह के मरीज़ों को अपना ब्लड शुगर (Blood Glucose) स्तर मापने के लिए हर बार सुई चुभानी नहीं पड़ेगी। यह खोज उन करोड़ों लोगों के लिए एक बड़ी राहत है, जो रोज़ाना ग्लूकोमीटर (Glucometer) का उपयोग करते हैं।

 

तकनीक का महत्व और कार्यप्रणाली

 

यह नई तकनीक पारंपरिक ग्लूकोमीटर से पूरी तरह अलग है। वर्तमान में, ग्लूकोज़ मापने के लिए फिंगर प्रिक टेस्ट (Finger Prick Test) का उपयोग किया जाता है, जिसमें रक्त की एक बूंद निकालने के लिए लैंसेट (सुई) का इस्तेमाल होता है। यह प्रक्रिया अक्सर दर्दनाक होती है और मरीज़ों को असहज महसूस कराती है, जिससे वे नियमित जाँच से कतराते हैं।

आईआईटी मद्रास की यह नई तकनीक गैर-आक्रामक सेंसर या विशेष प्रकार के बायो-सेंसर पर आधारित हो सकती है, जो त्वचा के माध्यम से या शरीर के अन्य तरल पदार्थों (जैसे पसीना या आँसू) के ज़रिए ग्लूकोज़ के स्तर को मापते हैं।

  • दर्द रहित जाँच: इस तकनीक का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह पूरी तरह से दर्द रहित है, क्योंकि इसमें त्वचा को भेदने या रक्त निकालने की आवश्यकता नहीं होती है।
  • सुविधा: यह जाँच को अधिक सुविधाजनक बना देगी, जिससे मरीज़ों के लिए दिन में कई बार जाँच करना आसान हो जाएगा, जो कि बेहतर डायबिटीज नियंत्रण के लिए आवश्यक है।

 

मधुमेह प्रबंधन में संभावित क्रांति

 

इस आविष्कार का प्रभाव केवल दर्द कम करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे मधुमेह प्रबंधन (Diabetes Management) में क्रांति ला सकता है।

विशेषता पारंपरिक फिंगर प्रिक टेस्ट आईआईटी मद्रास की नई तकनीक
जाँच का तरीका आक्रामक (रक्त निकालना) गैर-आक्रामक (दर्द रहित)
सुविधा असुविधाजनक, संक्रमण का खतरा अत्यधिक सुविधाजनक, रोज़ाना कई बार जाँच संभव
दीर्घकालिक प्रभाव नियमित जाँच से कतराना बेहतर अनुपालन, रक्त शर्करा का बेहतर नियंत्रण

यह नई तकनीक मरीज़ों को उनकी सेहत पर अधिक आसानी से और नियमित रूप से नज़र रखने की स्वतंत्रता देगी। नियमित और सटीक मॉनिटरिंग के साथ, डॉक्टर मरीज़ों के लिए बेहतर उपचार योजनाएँ बना सकेंगे और जटिलताओं (Complications) के जोखिम को कम कर सकेंगे। यह खोज भारत में स्वास्थ्य सेवा नवाचार (Healthcare Innovation) के लिए एक मील का पत्थर है।

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