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🔬 टीबी वैक्सीन विकास को गति: वयस्कों के लिए प्रभावी टीके की उम्मीद जगी

भारत में ट्यूबरकुलोसिस (टीबी) जैसी गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। टीबी के लिए एक संभावित नए वैक्सीन उम्मीदवार के विकास को बढ़ावा मिला है, क्योंकि ओडिशा के भुवनेश्वर स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ लाइफ साइंसेज (ILS) और आईआईटी भुवनेश्वर ने इस वैक्सीन कैंडिडेट से संबंधित तकनीक को एक निजी फर्म को हस्तांतरित (Technology Transfer) कर दिया है। यह कदम देश में टीबी नियंत्रण के प्रयासों के लिए एक गेम चेंजर साबित हो सकता है।

वर्तमान बीसीजी वैक्सीन की सीमाएँ

 

टीबी के खिलाफ वर्तमान में इस्तेमाल होने वाला एकमात्र टीका बेसिलस कैलमेट-गुएरिन (BCG) वैक्सीन है। यह दशकों से बच्चों के टीकाकरण कार्यक्रमों का हिस्सा रहा है, लेकिन इसकी प्रभावकारिता सीमित है:

  • शिशुओं को सुरक्षा: BCG वैक्सीन मुख्य रूप से शिशुओं और छोटे बच्चों को टीबी के सबसे गंभीर रूपों, जैसे टीबी मेनिनजाइटिस (TB Meningitis) और मिलियरी टीबी (Miliary TB) से सीमित सुरक्षा प्रदान करता है।

  • वयस्कों में अप्रभावी: टीबी का सबसे आम और संक्रामक रूप पल्मोनरी टीबी है। यह वैक्सीन किशोरों और वयस्कों में पल्मोनरी टीबी को रोकने में काफी हद तक अप्रभावी सिद्ध हुई है। यही कारण है कि टीबी का संक्रमण और फैलाव वयस्कों में जारी रहता है।

चूंकि भारत विश्व में टीबी के मामलों का सबसे बड़ा बोझ वहन करता है, इसलिए वयस्कों के लिए एक प्रभावी टीका विकसित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

नए वैक्सीन कैंडिडेट का लक्ष्य

 

आईएलएस और आईआईटी भुवनेश्वर द्वारा विकसित इस नए वैक्सीन उम्मीदवार का लक्ष्य वर्तमान बीसीजी वैक्सीन की कमियों को दूर करना है। इस नए टीके का विकास विशेष रूप से निम्नलिखित उद्देश्यों पर केंद्रित है:

  1. वयस्कों को सुरक्षा: इस वैक्सीन कैंडिडेट से किशोरों और वयस्कों में टीबी को रोकने में प्रभावी होने की उम्मीद है, जिससे संक्रामक टीबी के प्रसार को कम करने में मदद मिलेगी।

  2. बीसीजी की प्रभावकारिता बढ़ाना: यह टीका मौजूदा बीसीजी वैक्सीन की प्रभावकारिता को बढ़ाने में सहायक हो सकता है। इसे बीसीजी टीकाकरण के बाद एक बूस्टर खुराक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

तकनीक हस्तांतरण का महत्व

 

किसी भी वैज्ञानिक खोज को प्रयोगशाला से आम जनता तक पहुँचाने के लिए तकनीक हस्तांतरण (Technology Transfer) एक अनिवार्य कदम है। आईएलएस और आईआईटी भुवनेश्वर जैसे सार्वजनिक अनुसंधान संस्थानों द्वारा एक निजी फर्म को तकनीक सौंपने का अर्थ है कि यह टीका अब कठोर क्लिनिकल परीक्षणों (Clinical Trials) के चरणों में प्रवेश करेगा, जिसके बाद बड़े पैमाने पर इसका उत्पादन किया जा सकेगा।

यह सहयोग न केवल देश में टीबी उन्मूलन के लक्ष्य को प्राप्त करने में मदद करेगा, बल्कि “मेक इन इंडिया” पहल के तहत एक स्वदेशी समाधान विकसित करने की क्षमता को भी दर्शाता है। यदि यह टीका क्लिनिकल परीक्षणों में सफल होता है, तो यह वैश्विक स्वास्थ्य समुदाय के लिए एक बड़ी सफलता होगी।

©️ श्री गंगानगर न्यूज़ ©️