
भारत के शहरी बुनियादी ढांचे और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक चिंताजनक रिपोर्ट सामने आई है। एक ताजा स्वास्थ्य सर्वेक्षण और आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक साल के भीतर देश के 26 प्रमुख शहरों में सीवेज-मिश्रित (सीवर का गंदा पानी) पीने के पानी की आपूर्ति के कारण लगभग 5,500 लोग गंभीर रूप से बीमार पड़ चुके हैं। इस रिपोर्ट ने शहरी जल आपूर्ति प्रणाली की सुरक्षा और रखरखाव पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि आमतौर पर गर्मियों या मानसून में फैलने वाली जलजनित बीमारियां अब जनवरी की इस कड़ाके की ठंड में भी कहर बरपा रही हैं।
बीमारियों का त्रिकोण: टाइफाइड, हेपेटाइटिस और डायरिया
स्वास्थ्य मंत्रालय और जल शक्ति मंत्रालय के संयुक्त आंकड़ों से पता चला है कि दूषित पानी के सेवन से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले लोग तीन प्रमुख बीमारियों का शिकार हो रहे हैं:
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टाइफाइड (Typhoid): दूषित पानी में मौजूद साल्मोनेला टाइफी बैक्टीरिया के कारण शहरों में तेज बुखार और पेट दर्द के मामले तेजी से बढ़े हैं।
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हेपेटाइटिस-ए (Hepatitis A): यकृत (Liver) को प्रभावित करने वाला यह वायरस सीधे तौर पर मल-मूत्र मिश्रित पानी के माध्यम से फैल रहा है, जिससे पीलिया के मामलों में वृद्धि हुई है।
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डायरिया और गैस्ट्रोएंटेराइटिस: बच्चों और बुजुर्गों में निर्जलीकरण (Dehydration) और पेट के संक्रमण की समस्या सबसे अधिक देखी गई है।
पाइपलाइनों का पुराना होना और सीवेज का रिसाव
जांच में यह पाया गया कि अधिकांश प्रभावित शहरों में पीने के पानी की पाइपलाइनें और सीवेज लाइनें एक-दूसरे के बहुत करीब बिछाई गई हैं। कई दशकों पुरानी होने के कारण इन पाइपलाइनों में जंग लग चुका है या उनमें ‘लीकेज’ (रिसाव) शुरू हो गया है। विशेषकर घनी आबादी वाले इलाकों में, जब पानी की आपूर्ति का दबाव कम होता है, तो सीवर का गंदा पानी रिसकर पीने के पानी की लाइनों में मिल जाता है। यही ‘क्रॉस-कंटामिनेशन’ इस स्वास्थ्य संकट की मुख्य जड़ है।
सरकार का ‘मिशन मोड’ एक्शन प्लान
रिपोर्ट की गंभीरता को देखते हुए, केंद्र सरकार ने प्रभावित सभी 26 शहरों के नगर निगमों और जल बोर्डों को मिशन मोड पर काम करने का सख्त निर्देश दिया है। सरकार की रणनीति के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
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पाइपलाइनों का ऑडिट और मरम्मत: अगले तीन महीनों के भीतर पुरानी और जर्जर पाइपलाइनों को बदलने और रिसाव वाले क्षेत्रों को चिह्नित करने का आदेश दिया गया है।
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स्वच्छता अभियान 2.0: जल स्रोतों और ओवरहेड टैंकों की नियमित सफाई और क्लोरीनीकरण (Chlorination) को अनिवार्य कर दिया गया है।
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निगरानी प्रणाली: पानी की गुणवत्ता की रीयल-टाइम निगरानी के लिए सेंसर आधारित तकनीक का उपयोग करने पर जोर दिया जा रहा है।
विशेषज्ञों की सलाह: बचाव ही समाधान है
डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक बुनियादी ढांचे में सुधार नहीं होता, नागरिकों को अपनी सुरक्षा स्वयं करनी होगी। ठंड के मौसम में लोग अक्सर पानी उबालकर नहीं पीते, लेकिन वर्तमान स्थिति को देखते हुए निम्नलिखित सावधानियां जरूरी हैं:
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पीने के पानी को कम से कम 20 मिनट तक उबालें।
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पुराने वाटर प्यूरीफायर (RO) के फिल्टर समय पर बदलें।
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पानी के भंडारण वाले बर्तनों और टंकियों की नियमित सफाई करें।
यह रिपोर्ट एक चेतावनी है कि यदि शहरी जल प्रबंधन में तत्काल सुधार नहीं किया गया, तो आने वाली गर्मियों में यह आंकड़ा और भी भयावह हो सकता है।