🢀
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्देश: वैक्सीन दुष्प्रभावों के लिए ‘नो-फॉल्ट मुआवजा नीति’ बनाए केंद्र

नई दिल्ली। भारत के उच्चतम न्यायालय ने आज 10 मार्च 2026 को एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को टीकाकरण के प्रति जवाबदेही और मानवीय संवेदनाओं को जोड़ने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि कोविड-19 टीकाकरण के बाद गंभीर प्रतिकूल प्रभावों (Serious Adverse Events Following Immunization – SAEI) का सामना करने वाले नागरिकों के लिए एक ‘नो-फॉल्ट मुआवजा नीति’ (No-fault compensation policy) तैयार की जानी चाहिए।

जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ का कड़ा रुख

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने उन याचिकाओं पर सुनवाई की, जिनमें टीकाकरण के बाद हृदय संबंधी समस्याओं और अन्य गंभीर विकारों के कारण होने वाली मौतों या स्थायी विकलांगता के लिए मुआवजे की मांग की गई थी।

अदालत की प्रमुख टिप्पणियां:

  1. सरकार की जिम्मेदारी: कोर्ट ने कहा कि जब सरकार ने सार्वजनिक स्वास्थ्य के हित में बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियान चलाया, तो उन दुर्लभ मामलों में जहाँ गंभीर नुकसान हुआ है, नागरिकों को उनके हाल पर नहीं छोड़ा जा सकता।

  2. दोष नहीं, मदद प्राथमिक: ‘नो-फॉल्ट’ नीति का अर्थ है कि पीड़ित परिवार को यह साबित करने की जरूरत नहीं होगी कि वैक्सीन बनाने वाली कंपनी या सरकार की कोई गलती थी। यदि यह चिकित्सा विज्ञान से सिद्ध होता है कि समस्या वैक्सीन के कारण हुई, तो सहायता मिलनी चाहिए।

  3. पारदर्शिता का अभाव: पीठ ने इस बात पर चिंता जताई कि प्रतिकूल घटनाओं की रिपोर्टिंग के लिए अभी भी कोई सरल और पारदर्शी सार्वजनिक मंच नहीं है, जिससे आम आदमी अपनी शिकायत दर्ज करा सके।


क्या है ‘नो-फॉल्ट मुआवजा नीति’?

यह एक ऐसी प्रणाली है जो विकसित देशों (जैसे अमेरिका और यूके) में पहले से मौजूद है। इसके तहत:

  • यदि किसी व्यक्ति को टीके के कारण कोई गंभीर स्वास्थ्य हानि होती है, तो उसे लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के बजाय एक प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत मुआवजा दिया जाता है।

  • इसका उद्देश्य वैक्सीन निर्माता कंपनियों को अनावश्यक मुकदमों से बचाना और साथ ही नागरिक के ‘जीवन के अधिकार’ की रक्षा करना है।


पारदर्शी रिपोर्टिंग मंच की आवश्यकता

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को एक ऐसा डिजिटल पोर्टल बनाने का सुझाव दिया है जहाँ:

  • डॉक्टर और सामान्य नागरिक प्रतिकूल प्रभावों की रिपोर्ट कर सकें।

  • विशेषज्ञों की एक समिति इन मामलों की समयबद्ध (Time-bound) समीक्षा करे।

  • डेटा को सार्वजनिक किया जाए ताकि वैज्ञानिक समुदाय और जनता के बीच विश्वास बना रहे।

सरकार का पक्ष और चुनौतियां

इससे पहले की सुनवाइयों में, केंद्र सरकार ने तर्क दिया था कि टीकों के प्रतिकूल प्रभाव अत्यंत दुर्लभ हैं और टीकाकरण ने करोड़ों लोगों की जान बचाई है। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह टीकाकरण की प्रभावशीलता पर सवाल नहीं उठा रहा है, बल्कि उन ‘गिने-चुने’ पीड़ितों के प्रति सहानुभूति और सहायता सुनिश्चित करना चाहता है जिनका जीवन इसके दुष्प्रभावों से प्रभावित हुआ है।

आर्थिक प्रभाव: इस नीति के लागू होने से सरकारी खजाने पर वित्तीय भार पड़ेगा, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह भविष्य के किसी भी अन्य स्वास्थ्य संकट या टीकाकरण अभियान के लिए जनता का विश्वास जीतने में कारगर साबित होगा।


निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश स्वास्थ्य नीति में ‘न्याय’ के तत्व को जोड़ता है। यह स्वीकार करना कि जीवन रक्षक दवाओं के भी कुछ जोखिम हो सकते हैं और उन जोखिमों के पीड़ितों की जिम्मेदारी उठाना एक परिपक्व लोकतंत्र की पहचान है। अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है कि वह कितनी जल्दी और कितनी प्रभावी नीति के साथ कोर्ट के सामने वापस आती है।

©️ श्री गंगानगर न्यूज़ ©️