
नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता और स्वास्थ्य की सुविधा प्राप्त करना कोई “विशेषाधिकार” नहीं, बल्कि एक मौलिक अधिकार (Fundamental Right) है। अदालत ने इसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (Article 21) के तहत ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार’ से जोड़ा है।
1. अनुच्छेद 21 और गरिमापूर्ण जीवन
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि “जीवन का अधिकार” केवल सांस लेने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें गरिमा के साथ जीना भी शामिल है। मासिक धर्म स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में लाखों लड़कियां शिक्षा छोड़ देती हैं या संक्रमण का शिकार होती हैं, जो उनके मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।
2. स्कूलों के लिए कड़े निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को तीन मुख्य बिंदुओं पर तत्काल कार्रवाई करने का आदेश दिया है:
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निशुल्क सैनिटरी पैड: देश के सभी सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त और निजी स्कूलों में कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं को निशुल्क बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी पैड उपलब्ध कराए जाएं।
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स्वच्छ शौचालय: हर स्कूल में लड़कियों के लिए अलग, सुरक्षित और क्रियाशील शौचालयों की व्यवस्था अनिवार्य होगी, जिसमें पानी और साबुन की पर्याप्त उपलब्धता हो।
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डिस्पोजल तंत्र: सैनिटरी वेस्ट के निपटान के लिए स्कूलों में ‘इंसीनरेटर’ (भस्मक) या सुरक्षित डस्टबिन की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
3. शिक्षा में ‘ड्रॉपआउट’ दर को रोकना
अध्ययनों से पता चलता है कि भारत में लगभग 23% लड़कियां मासिक धर्म शुरू होने के बाद बुनियादी सुविधाओं और सामाजिक शर्म (Stigma) के कारण स्कूल छोड़ देती हैं।
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अदालत ने माना कि यह फैसला ‘राइट टू एजुकेशन’ (RTE) को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक है।
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जब स्कूलों में स्वच्छता और पैड उपलब्ध होंगे, तो छात्राओं की उपस्थिति बढ़ेगी और उनके सीखने की प्रक्रिया में बाधा नहीं आएगी।
4. राष्ट्रीय नीति का निर्माण
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह एक ‘नेशनल मेंस्ट्रुअल हाइजीन पॉलिसी’ तैयार करे। इस नीति के तहत:
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राज्यों को आवंटित फंड का पारदर्शी उपयोग सुनिश्चित किया जाए।
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मासिक धर्म से जुड़ी रूढ़ियों को तोड़ने के लिए जागरूकता अभियान चलाए जाएं।
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पर्यावरण के अनुकूल (Eco-friendly) उत्पादों के उपयोग को बढ़ावा दिया जाए।
5. सामाजिक प्रभाव और चुनौतियां
यह फैसला केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति का भी आह्वान है। ग्रामीण भारत में आज भी मासिक धर्म को “अशुद्ध” माना जाता है। अदालत के इस हस्तक्षेप से:
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विषय पर खुलकर बात करने की संस्कृति विकसित होगी।
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आशा (ASHA) कार्यकर्ताओं और आंगनवाड़ी केंद्रों की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाएगी।
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चुनौती: सबसे बड़ी चुनौती इन निर्देशों को जमीनी स्तर पर लागू करना और आवंटित बजट का सही इस्तेमाल सुनिश्चित करना होगा।
निष्कर्ष: एक समावेशी भविष्य की ओर
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारत की आधी आबादी के स्वास्थ्य और सम्मान के प्रति एक बड़ी जीत है। यह न केवल स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे को मजबूत करेगा, बल्कि महिलाओं के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण में भी सकारात्मक बदलाव लाएगा। अब यह जिम्मेदारी राज्यों की है कि वे इस फैसले को फाइलों से निकालकर स्कूलों के शौचालयों और कक्षाओं तक पहुंचाएं।