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वैश्विक महामारी समझौता: स्वास्थ्य संप्रभुता और समानता के लिए भारत की हुंकार

जिनेवा में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की महत्वपूर्ण बैठक से पहले, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में ‘महामारी समझौते’ (Pandemic Agreement) को लेकर बहस तेज हो गई है। इस वैश्विक चर्चा में भारत एक बार फिर ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील देशों) की बुलंद आवाज बनकर उभरा है। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य की किसी भी महामारी से निपटने की तैयारी केवल कागजों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसमें संसाधनों का न्यायपूर्ण बंटवारा अनिवार्य है।

यहाँ भारत के कड़े रुख और प्रस्तावित समझौते के प्रमुख बिंदुओं का विस्तृत विश्लेषण दिया गया है:


1. ‘ग्रुप फॉर इक्विटी’ और भारत का नेतृत्व

भारत ने विकासशील देशों के एक प्रभावशाली समूह, जिसे ‘ग्रुप फॉर इक्विटी’ कहा जा रहा है, के साथ मिलकर अपनी मांगें रखी हैं। भारत का तर्क है कि पिछली महामारियों के दौरान देखा गया कि अमीर देशों ने टीकों और दवाओं का भंडारण कर लिया, जबकि गरीब और विकासशील देश अपनी बारी का इंतजार करते रह गए। इस ‘वैक्सीन रंगभेद’ को खत्म करने के लिए भारत एक कानूनी ढांचे की मांग कर रहा है।

2. ‘डेटा के बदले दवा’ का सिद्धांत

इस समझौते का सबसे विवादास्पद और महत्वपूर्ण हिस्सा पैथोजन एक्सेस एंड बेनिफिट शेयरिंग (PABS) प्रणाली है। भारत का रुख इस पर अत्यंत स्पष्ट है:

  • जैविक नमूने साझा करना: यदि कोई विकासशील देश अपने क्षेत्र में पाए जाने वाले किसी नए वायरस या पैथोजन के जैविक नमूने और उसका जेनेटिक डेटा वैश्विक समुदाय के साथ साझा करता है, तो यह उसका बड़ा योगदान है।

  • बदले में अधिकार: भारत का कहना है कि इस डेटा के उपयोग से विकसित देशों की कंपनियां जो वैक्सीन या दवाएं बनाएंगी, उन पर डेटा साझा करने वाले देशों का कानूनी अधिकार होना चाहिए। इसमें मुफ्त वैक्सीन और सस्ती दरों पर दवाओं की उपलब्धता शामिल है। इसे ‘दान’ के बजाय ‘अधिकार’ के रूप में देखा जाना चाहिए।

3. वैश्विक कंपनियों के लिए 20% का फॉर्मूला

प्रस्तावित समझौते के तहत एक बड़ा प्रावधान यह भी है कि फार्मास्युटिकल कंपनियों को अपने कुल महामारी-संबंधी उत्पादों (जैसे वैक्सीन, डायग्नोस्टिक किट और दवाएं) का एक निश्चित हिस्सा वैश्विक स्वास्थ्य जरूरतों के लिए आरक्षित करना होगा:

  • 10% मुफ्त दान: कंपनियों को अपने उत्पादन का कम से कम 10% हिस्सा WHO को मुफ्त में देना होगा।

  • 10% सस्ती दर पर: अतिरिक्त 10% हिस्सा गैर-लाभकारी कीमतों पर विकासशील देशों को उपलब्ध कराना होगा। भारत इस 20% के फॉर्मूले को कड़ाई से लागू करने के पक्ष में है ताकि आपात स्थिति में आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) बाधित न हो।

4. तकनीक का हस्तांतरण (Technology Transfer)

भारत ने केवल तैयार माल (फिनिश्ड प्रॉडक्ट्स) की मांग नहीं की है, बल्कि तकनीक हस्तांतरण पर भी जोर दिया है। भारत का मानना है कि यदि भविष्य में कोई संकट आता है, तो विकासशील देशों के पास स्वयं दवाएं बनाने की क्षमता और बौद्धिक संपदा अधिकारों (IPR) में ढील होनी चाहिए। इससे न केवल कीमतें कम होंगी, बल्कि उत्पादन की गति भी बढ़ेगी।

5. चुनौतियाँ और विकसित देशों का रुख

हालांकि भारत की मांगें न्यायसंगत लगती हैं, लेकिन कई विकसित देश और बड़ी फार्मा कंपनियां इसका विरोध कर रही हैं। उनका तर्क है कि इससे नवाचार (Innovation) प्रभावित होगा और कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ेगा। इसके बावजूद, भारत ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के अपने सिद्धांत पर अडिग है, जिसका अर्थ है कि पूरी दुनिया एक परिवार है और स्वास्थ्य लाभ पर सबका समान हक है।

6. निष्कर्ष: एक नया वैश्विक स्वास्थ्य ढांचा

जिनेवा की बैठक इस समझौते की दिशा तय करेगी। यदि भारत अपनी शर्तों को मनवाने में सफल रहता है, तो यह वैश्विक स्वास्थ्य इतिहास में एक युगांतरकारी घटना होगी। यह समझौता यह सुनिश्चित करेगा कि भविष्य में कोई भी देश अपनी आर्थिक स्थिति के कारण जीवन रक्षक दवाओं से वंचित न रहे।

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