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विश्व मंच पर आयुर्वेद का उदय: विश्वसनीयता के लिए ‘मानकीकरण’ अनिवार्य 🌱🔬

नई दिल्ली। भारत की हजारों वर्ष पुरानी चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद अब केवल राष्ट्रीय धरोहर नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली ‘विश्व स्वास्थ्य आंदोलन’ के रूप में वैश्विक पटल पर तेज़ी से उभर रही है। सीएसआईआर-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस कम्युनिकेशन एंड पॉलिसी रिसर्च (CSIR-NISCPR) के वैज्ञानिकों ने हाल ही में ‘आयुर्वेद दिवस’ समारोह के दौरान इस वैश्विक स्वीकार्यता पर प्रकाश डाला और इसके भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती की ओर ध्यान दिलाया।

 

वैश्विक स्वीकार्यता और बढ़ती मांग

 

आयुर्वेद, जो स्वास्थ्य के प्रति निवारक और समग्र दृष्टिकोण पर आधारित है, पश्चिमी देशों सहित पूरी दुनिया में अपनी प्राकृतिक उपचार क्षमताओं के लिए व्यापक लोकप्रियता हासिल कर रहा है। जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों और साइड-इफेक्ट-मुक्त उपचारों की तलाश में, वैश्विक आबादी अब तेजी से आयुर्वेदिक पद्धतियों की ओर रुख कर रही है।

हालांकि, इस बढ़ती लोकप्रियता के साथ ही एक गंभीर समस्या भी सामने आई है: आयुर्वेदिक उत्पादों की गुणवत्ता और प्रामाणिकता।

 

विश्वसनीयता के लिए मानकीकरण आवश्यक

 

शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि आयुर्वेद को आधुनिक चिकित्सा प्रणालियों के साथ सफलतापूर्वक एकीकृत (Integration) करने और इसकी वैश्विक विश्वसनीयता को बनाए रखने के लिए मानकीकरण (Standardisation) और कठोर गुणवत्ता नियंत्रण की तत्काल आवश्यकता है।

उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि आयुर्वेदिक दवाओं और फॉर्मूलों की सटीकता सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित कदम अनिवार्य हैं:

  1. वैज्ञानिक प्रमाणन: आयुर्वेदिक उपचारों को आधुनिक चिकित्सा के समान साक्ष्य-आधारित मानदंडों (Evidence-based criteria) पर वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित किया जाना चाहिए।
  2. मिलावट पर रोक: बाजार में बिकने वाली आयुर्वेदिक दवाओं में मिलावट और उत्पादों की पैकेजिंग पर गलत जानकारी के प्रसार को रोकने के लिए सख्त नियामक तंत्र लागू किए जाने चाहिए।
  3. मानक उपचार दिशानिर्देश: समग्र उपचार के लिए ऐसे मानक दिशानिर्देश बनाने की आवश्यकता है जो आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा के सर्वोत्तम अभ्यासों का संयोजन करें।

 

आयुर्वेद का उज्ज्वल भविष्य

 

वैज्ञानिकों का मानना है कि केवल वैज्ञानिक प्रमाणन और मानकीकरण के माध्यम से ही अप्रभावी उपचारों को समाप्त किया जा सकता है और गंभीर स्वास्थ्य स्थितियों के लिए दोनों चिकित्सा धाराओं के बीच एक आम सहमति बनाई जा सकती है।

आयुर्वेद को एक वैश्विक स्वास्थ्य आंदोलन बनाने के लिए, इसकी गुणवत्ता और सत्यता पर विश्वास कायम रखना सबसे महत्वपूर्ण है। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि दुनिया को जो उपचार मिल रहा है, वह न केवल प्राचीन ज्ञान पर आधारित हो, बल्कि आधुनिक विज्ञान के मानकों पर भी खरा उतरे

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