
नई दिल्ली। आज के दौर में जहाँ हम आधुनिक तकनीक और विकास की बातें कर रहे हैं, वहीं एक ऐसा ‘साइलेंट किलर’ हमारे समाज को अंदर ही अंदर खोखला कर रहा है जिसे हम ‘मानसिक स्वास्थ्य’ कहते हैं। इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी (IPS) की हालिया रिपोर्ट ने एक चौंकाने वाला और चिंताजनक खुलासा किया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में मानसिक बीमारियों से जूझ रहे 80 से 85 प्रतिशत लोग समय पर डॉक्टरी सलाह या इलाज नहीं ले पा रहे हैं।
यह ‘ट्रीटमेंट गैप’ (इलाज का अंतर) यह दर्शाता है कि जागरूकता के दावों के बावजूद धरातल पर स्थिति अब भी काफी गंभीर है।
इलाज के इस बड़े अंतर के पीछे मुख्य कारण
विशेषज्ञों ने इस रिपोर्ट में उन कारणों का विस्तार से विश्लेषण किया है जो मरीजों को अस्पताल या क्लिनिक तक पहुँचने से रोकते हैं:
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सामाजिक कलंक (Social Stigma): भारत में आज भी मानसिक बीमारी को ‘पागलपन’ से जोड़कर देखा जाता है। लोग इस डर से अपनी समस्या साझा नहीं करते कि समाज उन्हें हीन भावना से देखेगा या उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाएगा।
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संसाधनों और विशेषज्ञों की कमी: भारत में आबादी के अनुपात में मनोचिकित्सकों (Psychiatrists) और मनोवैज्ञानिकों (Psychologists) की भारी कमी है। ग्रामीण इलाकों में तो स्थिति और भी खराब है, जहाँ मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं लगभग न के बराबर हैं।
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जागरूकता का अभाव: लोग अक्सर अवसाद (Depression) को केवल उदासी और चिंता (Anxiety) को केवल काम का तनाव मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। उन्हें यह समझ नहीं आता कि यह एक चिकित्सीय स्थिति है जिसका इलाज संभव है।
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महंगा इलाज: निजी क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य उपचार और थेरेपी सत्र काफी महंगे होते हैं, जो आम आदमी की पहुँच से बाहर हैं।
शारीरिक स्वास्थ्य बनाम मानसिक स्वास्थ्य
IPS की रिपोर्ट में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि समाज में एक ऐसी धारणा विकसित करनी होगी जहाँ मानसिक स्वास्थ्य को भी शारीरिक स्वास्थ्य (जैसे बुखार या चोट) जितनी ही प्राथमिकता मिले। यदि किसी को दिल की बीमारी होती है, तो वह तुरंत डॉक्टर के पास जाता है, लेकिन यदि कोई महीनों से गहरी उदासी या आत्मघाती विचारों से जूझ रहा है, तो उसे ‘मजबूत बनने’ या ‘सब ठीक हो जाएगा’ जैसी सलाह दी जाती है। यही उपेक्षा आगे चलकर गंभीर अवसाद और आत्महत्या जैसे आत्मघाती कदमों का कारण बनती है।
सरकार और समाज की भूमिका
रिपोर्ट में इस संकट से निपटने के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए हैं:
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टेली-मानस (Tele-MANAS): सरकार द्वारा शुरू की गई टेली-परामर्श सेवाओं का अधिक से अधिक प्रचार होना चाहिए ताकि लोग घर बैठे विशेषज्ञ से बात कर सकें।
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स्कूली शिक्षा में समावेश: बच्चों को शुरुआत से ही भावनाओं के प्रबंधन और मानसिक स्वास्थ्य के बारे में पढ़ाया जाना चाहिए।
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कार्यस्थल पर सहयोग: कॉरपोरेट और सरकारी दफ्तरों में ‘मेंटल हेल्थ लीव’ और तनाव मुक्त वातावरण सुनिश्चित करना अनिवार्य होना चाहिए।
निष्कर्ष: चुप्पी तोड़ना ही पहला इलाज है
मानसिक स्वास्थ्य के इस 85% के बड़े अंतर को केवल दवाओं से नहीं, बल्कि सहानुभूति और समझदारी से भरा जा सकता है। यदि हम अपने आस-पास किसी को परेशान देखें, तो उनसे बात करें और उन्हें विशेषज्ञ की सलाह लेने के लिए प्रोत्साहित करें। याद रखें, मानसिक रूप से बीमार होना कोई कमजोरी नहीं है, बल्कि एक स्वास्थ्य स्थिति है जिसे सही समय पर इलाज से ठीक किया जा सकता है।