
भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए आज 23 फरवरी, 2026 का दिन एक बड़ी उम्मीद लेकर आया है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों ने देश में अंग दान और प्रत्यारोपण (Organ Donation and Transplant) के परिदृश्य में एक क्रांतिकारी बदलाव की पुष्टि की है। आंकड़ों के अनुसार, भारत ने पिछले एक दशक में अंग प्रत्यारोपण के मामले में 400% की अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की है, जो लाखों मरीजों के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है।
आंकड़ों की कहानी: 5,000 से 20,000 तक का सफर
मंत्रालय द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, साल 2013 में पूरे भारत में केवल 5,000 अंग प्रत्यारोपण किए गए थे। बुनियादी ढांचे की कमी और जागरूकता के अभाव के कारण तब यह संख्या काफी सीमित थी। हालांकि, निरंतर प्रयासों और सरकारी नीतियों के चलते वर्ष 2025 के अंत तक यह संख्या बढ़कर 20,000 के करीब पहुँच गई है।
यह उछाल दर्शाता है कि भारत अब दुनिया के उन प्रमुख देशों की सूची में शामिल हो गया है जहाँ आधुनिक चिकित्सा तकनीक और सामाजिक जागरूकता का सफल समन्वय हो रहा है।
मृत दाता (Deceased Donor) कार्यक्रम में सुधार
इस पूरी रिपोर्ट का सबसे सकारात्मक पहलू ‘मृत दाता’ (Deceased Donors) श्रेणी में आया सुधार है।
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18% की हिस्सेदारी: वर्तमान में कुल प्रत्यारोपणों में से लगभग 18% मृत दाताओं (ब्रेन डेड घोषित व्यक्तियों) के माध्यम से किए जा रहे हैं। पहले यह आँकड़ा नगण्य था और ज्यादातर प्रत्यारोपण जीवित दाताओं (Living Donors) पर निर्भर थे।
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ब्रेन डेड पहचान: अस्पतालों में ‘ब्रेन डेड’ मामलों की शीघ्र पहचान और परिजनों की काउंसलिंग के लिए विशेष ‘ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर्स’ की नियुक्ति ने इस दिशा में बड़ी भूमिका निभाई है।
पंजीकरण और तकनीक: आधार आधारित सुगमता
अंग दान की प्रक्रिया को पारदर्शी और सरल बनाने के लिए सरकार ने डिजिटल इंडिया का सहारा लिया है।
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4.8 लाख पंजीकरण: आधार-आधारित ऑनलाइन पंजीकरण प्रणाली के माध्यम से अब तक 4.8 लाख से अधिक नागरिकों ने अपनी मृत्यु के पश्चात अंग दान करने का संकल्प लिया है।
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नोट्टो (NOTTO) की भूमिका: नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन (NOTTO) ने देशव्यापी नेटवर्क तैयार किया है, जिससे अंगों की बर्बादी कम हुई है और जरूरतमंद मरीजों तक अंग पहुँचाना तेज हुआ है।
इस सफलता के पीछे के मुख्य कारण
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नीतिगत सुधार: केंद्र सरकार ने ‘एक देश, एक नीति’ के तहत अंग प्रत्यारोपण के नियमों को सरल बनाया है। अब 65 वर्ष से अधिक आयु के लोग भी अंग प्राप्त करने के लिए पंजीकरण करा सकते हैं।
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लागत में कमी: आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं के माध्यम से आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए भी अंग प्रत्यारोपण की पहुंच सुलभ हुई है।
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ग्रीन कॉरिडोर: पुलिस और प्रशासन के समन्वय से ‘ग्रीन कॉरिडोर’ बनाकर अंगों को कम से कम समय में एक शहर से दूसरे शहर पहुँचाने की व्यवस्था ने सफलता दर बढ़ाई है।
चुनौतियां और भविष्य की राह
भले ही हम 20,000 के आंकड़े तक पहुँच गए हैं, लेकिन भारत में अंगों की मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर अभी भी बहुत बड़ा है। हर साल लाखों लोग केवल इसलिए दम तोड़ देते हैं क्योंकि उन्हें समय पर किडनी, लिवर या हृदय नहीं मिल पाता।
भविष्य का लक्ष्य: स्वास्थ्य मंत्रालय का लक्ष्य आगामी तीन वर्षों में मृत दान (Deceased Donation) की दर को और बढ़ाना है ताकि जीवित दाताओं पर निर्भरता कम की जा सके। इसके लिए ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता अभियान और मेडिकल कॉलेजों में आधुनिक बुनियादी ढांचे का विस्तार किया जा रहा है।
निष्कर्ष
अंग प्रत्यारोपण में यह ऐतिहासिक उछाल केवल एक सांख्यिकीय उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह बदलते भारतीय समाज की उस सोच का परिचायक है जहाँ ‘अंग दान’ को ‘महादान’ माना जा रहा है। यदि जागरूकता की यह लहर इसी तरह जारी रही, तो भारत जल्द ही इस क्षेत्र में वैश्विक गुरु बनकर उभरेगा।