
रीढ़ की हड्डी (Spinal Cord) में चोट लगना अब तक एक ऐसी स्थिति मानी जाती थी जहाँ तंत्रिका तंत्र की मरम्मत करना लगभग असंभव था। शरीर की अन्य कोशिकाओं के विपरीत, रीढ़ की हड्डी के न्यूरॉन्स (Nerve cells) एक बार क्षतिग्रस्त होने के बाद खुद को ठीक नहीं कर पाते। लेकिन अब, स्टेम सेल और नैनोटेक्नोलॉजी के संगम ने इस धारणा को चुनौती दी है।
1. लैब में विकसित स्पाइनल कॉर्ड ‘ऑर्गनॉइड’ क्या है?
वैज्ञानिकों ने इंसानी स्टेम कोशिकाओं का उपयोग करके एक जटिल, त्रिविमीय (3D) ऊतक विकसित किया है जिसे ‘ऑर्गनॉइड’ कहा जाता है।
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यह ऑर्गनॉइड एक असली मानव स्पाइनल कॉर्ड की तरह व्यवहार करता है।
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इसमें वही न्यूरॉन्स और सहायक कोशिकाएं होती हैं जो हमारे तंत्रिका तंत्र का हिस्सा हैं।
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इसकी मदद से वैज्ञानिकों को यह समझने में आसानी हुई कि चोट लगने के बाद कोशिकाएं कैसे व्यवहार करती हैं और दवाओं का उन पर क्या असर होता है।
2. “डांसिंग मॉलिक्यूल्स” (Dancing Molecules) थेरेपी
इस शोध का सबसे रोमांचक हिस्सा “डांसिंग मॉलिक्यूल्स” नामक एक नई नैनो-थेरेपी है। इसे यह नाम इसलिए दिया गया है क्योंकि इसमें शामिल अणु लगातार गतिशील (Motion) रहते हैं।
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कार्यप्रणाली: यह थेरेपी एक तरल इंजेक्टेबल जेल के रूप में होती है। जब इसे क्षतिग्रस्त हिस्से में इंजेक्ट किया जाता है, तो इसके अणु ‘नाचते’ हुए न्यूरॉन्स की सतह पर मौजूद रिसेप्टर्स के साथ संपर्क करते हैं।
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सिग्नलिंग: ये अणु गतिशील होने के कारण स्थिर अणुओं की तुलना में कोशिकाओं के साथ बेहतर तरीके से जुड़ पाते हैं और उन्हें ‘विकास’ (Growth) का संकेत देते हैं।
3. शोध के आश्चर्यजनक परिणाम
जब इस थेरेपी को लैब में विकसित स्पाइनल कॉर्ड मॉडल पर लागू किया गया, तो वैज्ञानिकों ने तीन प्रमुख सकारात्मक बदलाव देखे:
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एक्सोनल रिजनरेशन (Axonal Regeneration): कटे हुए तंत्रिका तंतु (Nerve fibers) फिर से बढ़ने लगे। यह किसी चमत्कार से कम नहीं था, क्योंकि रीढ़ की हड्डी में तंतुओं का दोबारा जुड़ना ही रिकवरी की पहली शर्त है।
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स्कार टिश्यू में कमी: चोट वाली जगह पर अक्सर ‘स्कार टिश्यू’ (निशान वाले ऊतक) बन जाते हैं, जो नई नसों के विकास को रोकते हैं। इस थेरेपी ने उस अवरोधक परत को काफी कम कर दिया।
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मायलिनेशन (Myelination): नसों के ऊपर सुरक्षात्मक परत (Myelin sheath) फिर से बनने लगी, जो विद्युत संकेतों को मस्तिष्क तक ले जाने के लिए अनिवार्य है।
4. भविष्य की संभावनाएं: क्या पक्षाघात खत्म होगा?
यह खोज उन लाखों लोगों के लिए उम्मीद की एक नई किरण है जो स्पाइनल कॉर्ड इंजरी के कारण व्हीलचेयर पर हैं।
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मानव परीक्षण (Human Trials): शोधकर्ताओं का लक्ष्य अब इस थेरेपी को क्लिनिकल ट्रायल की ओर ले जाना है। यदि यह मनुष्यों में भी उतनी ही प्रभावी रही, तो आने वाले कुछ वर्षों में रीढ़ की हड्डी की चोट का इलाज संभव हो सकेगा।
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बहु-उपयोग: इस तकनीक का उपयोग भविष्य में पार्किंसंस और अल्जाइमर जैसी न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों के इलाज में भी किया जा सकता है।
विशेषज्ञों का मत
नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के मुख्य शोधकर्ता ने बताया, “हमने न केवल कोशिकाओं को बढ़ने के लिए प्रेरित किया, बल्कि उन्हें एक ऐसा वातावरण दिया जहाँ वे प्राकृतिक रूप से संचार कर सकें। ‘डांसिंग मॉलिक्यूल्स’ का उपयोग करके हमने प्रकृति की अपनी मरम्मत प्रणाली को सक्रिय कर दिया है।”
निष्कर्ष: मेडिकल साइंस का यह नवाचार साबित करता है कि असंभव कुछ भी नहीं है। प्रयोगशाला में विकसित यह ‘मिनी स्पाइनल कॉर्ड’ भविष्य में पूर्ण विकसित उपचार की दिशा में पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम है।