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डिजिटल हेल्थ क्रांति: 70 करोड़ ‘आभा’ आईडी के साथ बदलता भारत का स्वास्थ्य परिदृश्य

वर्ष 2026 की शुरुआत भारत के लिए एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित हुई है। देश में 70 करोड़ से अधिक नागरिकों ने अपनी आभा (ABHA) आईडी बनवा ली है। यह केवल एक पहचान संख्या नहीं है, बल्कि एक ऐसा डिजिटल सेतु है जो मरीज, डॉक्टर और अस्पताल को एक सुरक्षित नेटवर्क के माध्यम से जोड़ता है।

कागजी फाइलों से मिली आजादी

पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली में मरीजों को सालों पुरानी रिपोर्ट, लैब टेस्ट और प्रिस्क्रिप्शन की भारी-भरकम फाइलें संभालनी पड़ती थीं। अक्सर आपातकालीन स्थिति में या किसी नए डॉक्टर के पास जाने पर ये दस्तावेज उपलब्ध नहीं होते थे, जिससे इलाज में देरी होती थी।

अब आभा आईडी के माध्यम से मरीज का पूरा मेडिकल इतिहास एक क्लिक पर उपलब्ध है। इसमें टीकाकरण रिकॉर्ड, पुरानी बीमारियों का विवरण, एलर्जी और सर्जरी की जानकारी सुरक्षित रूप से ‘डिजिटल लॉकर’ में रहती है। डॉक्टर मरीज की सहमति (Consent) के बाद ही इन रिकॉर्ड्स को देख सकते हैं, जिससे डेटा की गोपनीयता भी सुनिश्चित होती है।

AI और ‘रिस्क प्रेडिक्शन’: भविष्य का सुरक्षा कवच

इस डिजिटल मिशन का सबसे रोमांचक पहलू आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का एकीकरण है। सरकार अब ऐसे एआई-आधारित ‘रिस्क प्रेडिक्शन’ टूल्स पर काम कर रही है जो आभा डेटाबेस का विश्लेषण करेंगे।

यह तकनीक किसी व्यक्ति के जीवनशैली डेटा, पारिवारिक इतिहास और नियमित लैब रिपोर्ट्स के आधार पर यह अनुमान लगा सकेगी कि उसे भविष्य में डायबिटीज, उच्च रक्तचाप या हृदय रोग जैसी बीमारियाँ होने की कितनी संभावना है। उदाहरण के लिए, यदि किसी मरीज का शुगर लेवल धीरे-धीरे बढ़ रहा है, तो सिस्टम उसे और उसके डॉक्टर को पहले ही ‘रेड फ्लैग’ या चेतावनी दे देगा, जिससे बीमारी होने से पहले ही उसे रोका जा सकेगा।

प्रशासनिक दक्षता और पारदर्शिता

डिजिटल हेल्थ आईडी से केवल मरीजों को ही नहीं, बल्कि सरकार को भी नीति निर्धारण में मदद मिल रही है। डेटा के माध्यम से यह पता लगाना आसान हो गया है कि किस क्षेत्र में कौन सी बीमारी अधिक फैल रही है। इससे स्वास्थ्य संसाधनों जैसे दवाओं, बेड और डॉक्टरों की तैनाती अधिक सटीकता से की जा रही है। साथ ही, यह स्वास्थ्य योजनाओं (जैसे आयुष्मान भारत बीमा) में होने वाली धोखाधड़ी को रोकने में भी अत्यंत प्रभावी है।

चुनौतियां और सुरक्षा

इतने बड़े पैमाने पर डेटा संग्रह के साथ साइबर सुरक्षा और डेटा गोपनीयता की चुनौतियां भी आती हैं। भारत सरकार ने इसके लिए सख्त ‘डेटा प्रोटेक्शन’ कानून और एन्क्रिप्शन तकनीकों का उपयोग किया है ताकि किसी भी मरीज की निजी जानकारी गलत हाथों में न जाए।

निष्कर्ष 70 करोड़ आभा आईडी का आंकड़ा इस बात का प्रमाण है कि भारतीय समाज डिजिटल बदलाव को स्वीकार कर रहा है। यह तकनीक न केवल इलाज को आसान बना रही है, बल्कि भारत को ‘बीमारियों के इलाज’ (Sick-care) से ‘स्वास्थ्य की देखभाल’ (Health-care) की ओर ले जा रही है। 2026 तक का यह सफर स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक किफायती, सुलभ और व्यक्तिगत बनाने की दिशा में एक बड़ी जीत है।

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