
जेनेवा/नई दिल्ली। जैसे-जैसे वैश्विक तापमान रिकॉर्ड स्तर को पार कर रहा है, दक्षिण एशियाई देशों, विशेषकर भारत और पाकिस्तान में गर्मी का प्रकोप अब केवल एक मौसमी बदलाव नहीं, बल्कि एक ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल’ बन गया है। इस गंभीर संकट को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने आज एक ऐतिहासिक पहल करते हुए दक्षिण एशिया के लिए समर्पित ‘क्लाइमेट-हेल्थ डेस्क’ (Climate-Health Desk) लॉन्च करने की घोषणा की है।
इस डेस्क का मुख्य उद्देश्य जलवायु विज्ञान और चिकित्सा विज्ञान के बीच की दूरी को कम करना है ताकि भीषण गर्मी (Heat-wave) से होने वाली लाखों मौतों को रोका जा सके।
भयानक आँकड़े: 50°C का तापमान और 2 लाख मौतें
हालिया वैज्ञानिक रिपोर्ट्स के अनुसार, दक्षिण एशिया में ‘वेट-बल्ब टेम्परेचर’ (गर्मी और नमी का घातक मिश्रण) तेजी से बढ़ रहा है। भारत और पाकिस्तान के कई शहरों में गर्मी के दौरान तापमान 50°C के करीब पहुँच जाता है। आँकड़े बताते हैं कि इस जानलेवा गर्मी के कारण अकेले इस क्षेत्र में हर साल 2 लाख से अधिक लोग अपनी जान गँवा देते हैं। इनमें अधिकांश वे मजदूर, किसान और बुजुर्ग होते हैं जो सीधे तौर पर धूप के संपर्क में आते हैं या जिनके पास ठंडक के पर्याप्त साधन नहीं होते।
‘क्लाइमेट-हेल्थ डेस्क’ कैसे काम करेगा?
यह डेस्क एक एकीकृत सूचना तंत्र (Integrated Information System) के रूप में कार्य करेगा। इसकी कार्यप्रणाली के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
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अर्ली वार्निंग सिस्टम (EWS): उपग्रह डेटा और मौसम संबंधी पूर्वानुमानों का उपयोग करके, यह डेस्क उन क्षेत्रों की पहचान करेगा जहाँ ‘हीट वेव’ आने वाली है। यह सूचना स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों तक पहुँचाई जाएगी ताकि वे अस्पतालों में बेड और दवाओं का अग्रिम प्रबंधन कर सकें।
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वैज्ञानिक डेटा का विश्लेषण: यह डेस्क इस बात का अध्ययन करेगा कि तापमान में वृद्धि का हृदय रोगों, गुर्दे की खराबी (Kidney Failure) और श्वसन संबंधी समस्याओं पर क्या प्रभाव पड़ता है।
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सामुदायिक जागरूकता: डेस्क के माध्यम से स्थानीय भाषाओं में गाइडलाइन्स जारी की जाएंगी, जिनमें बताया जाएगा कि हीट स्ट्रोक के शुरुआती लक्षण क्या हैं और प्राथमिक उपचार कैसे किया जाए।
हीट-वेव से जुड़ी बीमारियों का बढ़ता बोझ
अत्यधिक गर्मी केवल प्यास या बेचैनी का कारण नहीं बनती, बल्कि यह शरीर के अंगों को निष्क्रिय करने की क्षमता रखती है। ‘क्लाइमेट-हेल्थ डेस्क’ विशेष रूप से हीट स्ट्रोक, हीट थकावट (Heat Exhaustion) और क्रोनिक किडनी डिजीज (CKD) जैसे खतरों पर ध्यान केंद्रित करेगा, जो निर्जलीकरण (Dehydration) के कारण तेजी से फैल रहे हैं।
भारत और पाकिस्तान के लिए यह पहल क्यों महत्वपूर्ण है?
दक्षिण एशिया की घनी आबादी और यहाँ की भौगोलिक स्थिति इसे जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाती है।
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कृषि क्षेत्र पर प्रभाव: लाखों लोग खुले खेतों में काम करते हैं जहाँ तापमान नियंत्रित करना असंभव है।
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शहरी गर्मी द्वीप (Urban Heat Islands): कंक्रीट के जंगलों (शहरों) में गर्मी फंस जाती है, जिससे रात का तापमान भी कम नहीं होता।
WHO के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के निदेशक ने कहा, “हम केवल मौसम बदलने का इंतजार नहीं कर सकते; हमें मौसम के अनुसार अपनी स्वास्थ्य प्रणालियों को बदलना होगा। यह डेस्क लाखों लोगों के लिए जीवनदान साबित होगा।”
निष्कर्ष और आगे की राह
‘क्लाइमेट-हेल्थ डेस्क’ की स्थापना एक सही दिशा में उठाया गया कदम है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि स्थानीय सरकारें इस डेटा का उपयोग कितनी सक्रियता से करती हैं। क्या हमारे शहरों में ‘कूल रूफ’ नीतियां लागू होंगी? क्या हमारे स्वास्थ्य केंद्रों के पास पर्याप्त ओआरएस (ORS) और कूलिंग वार्ड्स होंगे? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर आने वाले महीनों में मिलेगा।
निश्चित रूप से, यह पहल 2026 में स्वास्थ्य और पर्यावरण के तालमेल का एक नया अध्याय लिख रही है।