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अंगदान और प्रत्यारोपण: भारत की वैश्विक छलांग और एक नई उम्मीद

नई दिल्ली। पिछले एक दशक में भारत के स्वास्थ्य ढांचे में आए क्रांतिकारी बदलावों का परिणाम अब आंकड़ों में दिखने लगा है। जहाँ एक समय में अंग प्रत्यारोपण के लिए भारतीयों को विदेशों की ओर देखना पड़ता था या लंबी प्रतीक्षा सूची का सामना करना पड़ता था, आज भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल है जहाँ सबसे जटिल प्रत्यारोपण सफलतापूर्वक किए जा रहे हैं।

1. आंकड़ों में बड़ी सफलता: 5,000 से 20,000 तक का सफर

वर्ष 2013 में भारत में कुल प्रत्यारोपणों की संख्या मात्र 5,000 के आसपास थी। स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, 2025 के अंत तक यह आंकड़ा 20,000 के करीब पहुंच गया है। यह चार गुना वृद्धि दर्शाती है कि देश में न केवल अस्पतालों की संख्या और तकनीक बढ़ी है, बल्कि लोगों की सोच में भी बड़ा बदलाव आया है।

2. ‘मृत दाता’ (Deceased Donation) में बढ़ती भागीदारी

भारत में अंगदान की सबसे बड़ी चुनौती ‘ब्रेन डेड’ (Brain Dead) दाताओं के अंगों का उपयोग करना रहा है। पारंपरिक रूप से भारत ‘जीवित दाताओं’ (Living Donors) पर अधिक निर्भर रहा है, लेकिन अब स्थिति बदल रही है:

  • वर्तमान में लगभग 18% प्रत्यारोपण मृत दाताओं (Deceased Donors) के माध्यम से किए जा रहे हैं।

  • यह परिवर्तन ‘नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन’ (NOTTO) के सुव्यवस्थित नेटवर्क और जन-जागरूकता अभियानों का परिणाम है।

  • एक मृत व्यक्ति का अंगदान 8 अलग-अलग लोगों को नया जीवन दे सकता है, और भारतीय समाज अब इस सत्य को स्वीकार कर रहा है।

3. हैंड ट्रांसप्लांट: दुनिया में नंबर-1 बना भारत

इस रिपोर्ट की सबसे गौरवशाली उपलब्धि हैंड ट्रांसप्लांट (Hand Transplants) क्षेत्र में है। भारत अब दुनिया में सबसे अधिक हाथ प्रत्यारोपण करने वाला देश बन गया है।

  • यह प्रक्रिया न केवल अत्यधिक जटिल है, बल्कि इसमें सूक्ष्म-सर्जरी (Micro-surgery) की उच्चतम निपुणता की आवश्यकता होती है।

  • केरल और दिल्ली के सरकारी व निजी अस्पतालों ने इस क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी धाक जमाई है, जहाँ दुर्घटनाओं में हाथ गंवा चुके लोगों को नया जीवन और कार्यक्षमता प्रदान की गई है।

4. सरकार की ‘एक राष्ट्र, एक नीति’ (One Nation, One Policy)

इस सफलता के पीछे नीतिगत सुधारों का बड़ा हाथ है। केंद्र सरकार ने प्रत्यारोपण की प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं:

  • आयु सीमा को हटाना: पहले 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोग अंग प्राप्त करने के लिए पंजीकरण नहीं करा सकते थे, जिसे अब हटा दिया गया है।

  • पंजीकरण शुल्क की समाप्ति: कई राज्यों में अंग पंजीकरण के लिए लगने वाले शुल्क को खत्म कर दिया गया है।

  • लीव पॉलिसी: सरकारी कर्मचारियों के लिए अंगदान करने पर विशेष सवैतनिक अवकाश (Special Casual Leave) की व्यवस्था की गई है।

5. चुनौतियाँ और भविष्य का रोडमैप

इतनी प्रगति के बावजूद, भारत में अंगों की मांग और आपूर्ति के बीच अभी भी बड़ा अंतर है। भारत में प्रति मिलियन जनसंख्या पर अंगदान की दर अभी भी विकसित देशों की तुलना में कम है। स्वास्थ्य मंत्रालय अब स्कूलों और कॉलेजों के पाठ्यक्रम में अंगदान को शामिल करने और ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्यारोपण केंद्रों के विस्तार पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।


निष्कर्ष: भारत का अंगदान के क्षेत्र में इतिहास रचना न केवल चिकित्सा जगत की जीत है, बल्कि यह भारतीयों की ‘परोपकार’ की भावना का भी प्रतीक है। हैंड ट्रांसप्लांट में वैश्विक नेतृत्व और मृत दाताओं की बढ़ती संख्या इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में भारत दुनिया के लिए ‘मेडिकल केयर’ का अंतिम गंतव्य बनेगा।

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