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लालगढ़ जातन थाना क्षेत्र: जानलेवा हमले के मामले में राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ी राहत, सजा निलंबन (Suspension of Sentence) की अर्जी मंजूर

श्रीगंगानगर/जोधपुर: राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के लालगढ़ जातन थाना क्षेत्र से जुड़े एक गंभीर और बहुचर्चित आपराधिक मामले में राजस्थान उच्च न्यायालय (जोधपुर पीठ) से इस सप्ताह एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी अपडेट सामने आया है। वर्ष 2020 से चले आ रहे आपसी खूनी संघर्ष और जानलेवा हमले के एक मामले में दोषी करार दिए गए तीन ग्रामीणों—मेजर सिंह, लखवीर सिंह और प्रगत सिंह—को माननीय उच्च न्यायालय ने बड़ी राहत देते हुए उनकी सजा को निलंबित (Suspension of Sentence) करने की अर्जी को मंजूरी दे दी है। न्यायालय का यह फैसला कानूनी प्रक्रिया, सामाजिक सामंजस्य और लोक अदालत की भावना के दृष्टिकोण से बेहद अहम माना जा रहा है।

मामला क्या था? (वर्ष 2020 का खूनी संघर्ष)

इस पूरे विवाद की जड़ें आज से करीब छह साल पीछे यानी वर्ष 2020 में जाती हैं। लालगढ़ जातन थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले गांव 15 एल.एन.पी. (धनी) में रहने वाले इन पक्षों के बीच किसी पुरानी रंजिश या तात्कालिक विवाद को लेकर गंभीर खूनी संघर्ष हुआ था। इस झगड़े में धारदार और लाठी-डंडों जैसे हथियारों का इस्तेमाल किया गया था, जिसके परिणामस्वरूप कुछ लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।

मामले की गंभीरता को देखते हुए लालगढ़ जातन थाना पुलिस ने तत्कालीन समय में तत्परता दिखाते हुए आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 307 (जानलेवा हमला), धारा 323, 341 और अन्य संगीन धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया था। पुलिस ने मामले की गहन तफ्तीश के बाद चालान कोर्ट में पेश किया।

सेशंस कोर्ट श्रीगंगानगर का फैसला (मई 2026)

यह मामला पिछले छह सालों से श्रीगंगानगर की जिला एवं सेशंस न्यायालय में विचाराधीन था। लंबी कानूनी बहस, गवाहों के बयानों और चिकित्सकीय रिपोर्ट (Medical Reports) के आधार पर, इसी वर्ष मई 2026 में सेशंस कोर्ट, श्रीगंगानगर ने अपना अंतिम फैसला सुनाया था।

अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों को पर्याप्त मानते हुए आरोपी मेजर सिंह, लखवीर सिंह और प्रगत सिंह को जानलेवा हमले (धारा 307) व अन्य सह-धाराओं के तहत दोषी (Convicted) करार दिया था। दोषी ठहराए जाने के बाद अदालत ने तीनों को कारावास और आर्थिक दंड की सजा सुनाई थी, जिसके बाद नियमानुसार उन्हें जेल भेज दिया गया था।

उच्च न्यायालय में अपील और ‘लोक अदालत’ की भावना

सेशंस कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा के खिलाफ दोषियों के कानूनी प्रतिनिधियों (अधिवक्ताओं) ने राजस्थान हाईकोर्ट, जोधपुर का दरवाजा खटखटाया। इस सप्ताह हाईकोर्ट में सजा के निलंबन (Suspension of Sentence) की अर्जी पर सुनवाई हुई।

सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष एक बेहद महत्वपूर्ण और सकारात्मक पहलू रखा गया। अधिवक्ताओं ने अदालत को अवगत कराया कि घटना के बाद से पिछले कुछ समय में दोनों पक्षों के बीच कड़वाहट कम हुई है। ग्रामीण परिवेश और आपसी भाईचारे को बहाल करने के उद्देश्य से, दोनों गुटों के मौजिज लोगों और परिजनों ने बैठकर आपस में राजीनामा (Compromise) कर लिया है।

कानूनी समझ: लोक अदालत की भावना

भारतीय न्याय प्रणाली में ‘लोक अदालत’ और आपसी समझौते को हमेशा प्रोत्साहित किया जाता है ताकि समाज में दुश्मनी का अंत हो सके और लोग शांति से रह सकें। हालांकि धारा 307 गैर-शमनीय (Non-Compoundable) अपराध की श्रेणी में आता है, लेकिन सजा के खिलाफ अपील लंबित रहने के दौरान अदालतें दोनों पक्षों के बीच पूर्ण राजीनामे को सजा निलंबन या सजा कम करने का एक मजबूत आधार मान सकती हैं।

माननीय उच्च न्यायालय का निर्णय

हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों के बीच हुए इस आपसी समझौते और लोक अदालत की मूल भावना को गहराई से समझा। न्यायालय ने पाया कि चूंकि दोनों पक्ष अब भविष्य में शांतिपूर्वक रहने को तैयार हैं और उनके बीच का पुराना विवाद पूरी तरह सुलझ चुका है, इसलिए जेल में बंद रखना सामाजिक सामंजस्य के हित में नहीं होगा।

सभी तथ्यों और कानूनी नजीरों को ध्यान में रखते हुए, माननीय उच्च न्यायालय ने इस सप्ताह मेजर सिंह, लखवीर सिंह और प्रगत सिंह की सजा को निलंबित करने की अर्जी को स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही न्यायालय ने तय शर्तों और जमानत मुचलके (Bail Bonds) पर उन्हें रिहा करने के आदेश जारी कर दिए हैं।

सामाजिक प्रभाव और निष्कर्ष

लालगढ़ जातन क्षेत्र के 15 एल.एन.पी. गांव के ग्रामीणों ने इस फैसले पर संतोष व्यक्त किया है। स्थानीय जानकारों का मानना है कि अदालती लड़ाइयों में सालों-साल बर्बाद होने के बजाय अगर पक्षकार आपसी समझदारी से विवादों का निपटारा कर लें, तो इससे न केवल अदालतों का बोझ कम होता है, बल्कि गांवों में गुटबाजी और अपराध पर भी लगाम लगती है। हाईकोर्ट का यह आदेश इसी सामाजिक सुधार और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की दिशा में एक बड़ा कदम है।

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