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रेल यात्रियों की बढ़ी मुश्किलें: 48 साल पुरानी ट्रेन पर भार, सुविधाओं के अभाव में पिसते यात्री

श्रीगंगानगर। राजस्थान के सीमावर्ती जिले श्रीगंगानगर के निवासियों के लिए रेल सेवाएं हमेशा से ही जीवन रेखा रही हैं। लेकिन वर्तमान में, उत्तर पश्चिम रेलवे की एक ऐसी महत्वपूर्ण ट्रेन जो पिछले 48 वर्षों से निरंतर अपनी सेवाएं दे रही है, वह अब यात्रियों के भारी दबाव और संसाधनों की कमी के कारण चर्चा का विषय बनी हुई है। जैसे-जैसे गर्मी की छुट्टियां और शादी-विवाह का सीजन नजदीक आ रहा है, इस ट्रेन पर यात्रियों का भार अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया है, जिससे आम यात्री खासे परेशान हैं।

आधा दशक पुरानी सेवा, आज भी सबसे भरोसेमंद

पिछले 48 सालों से संचालित हो रही यह ट्रेन श्रीगंगानगर को देश के अन्य प्रमुख हिस्सों से जोड़ने का सबसे सुलभ और सस्ता साधन रही है। अपनी शुरुआत के समय से ही इसने व्यापारियों, विद्यार्थियों और मरीजों के लिए एक वरदान की तरह काम किया है। हालांकि, विडंबना यह है कि इन पांच दशकों में शहर की आबादी और यात्रियों की संख्या में कई गुना वृद्धि हुई है, लेकिन इस ट्रेन की क्षमता और डिब्बों की संख्या में उस अनुपात में बढ़ोतरी नहीं की गई है।

लंबी वेटिंग लिस्ट और ‘नो रूम’ के हालात

वर्तमान स्थिति यह है कि ट्रेन के स्लीपर और एसी कोच में वेटिंग लिस्ट का आंकड़ा सैकड़ों के पार जा चुका है। कई बार तो स्थिति ‘नो रूम’ तक पहुंच जाती है, जिससे यात्रियों को कन्फर्म टिकट मिलना लगभग असंभव हो जाता है।

यात्रियों की बढ़ती मुश्किलों के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  1. सीमित कोच: ट्रेन में कोचों की संख्या पुरानी समय सीमा के अनुसार ही तय है, जो आज की भीड़ को संभालने के लिए नाकाफी है।

  2. वैकल्पिक ट्रेनों का अभाव: श्रीगंगानगर से लंबी दूरी की यात्रा के लिए पर्याप्त वैकल्पिक ट्रेनें उपलब्ध नहीं हैं, जिससे सारा भार इसी पुरानी ट्रेन पर आ जाता है।

  3. रिजर्वेशन की मारामारी: तत्काल कोटा भी कुछ ही सेकंडों में भर जाता है, जिसके कारण आम जनता को मजबूरन जनरल डिब्बों में भेड़-बकरियों की तरह सफर करना पड़ता है।

स्थानीय जनता की मांग और आक्रोश

श्रीगंगानगर के स्थानीय निवासियों, व्यापारी मंडलों और दैनिक यात्रियों ने रेलवे प्रशासन के प्रति गहरा रोष व्यक्त किया है। लोगों का कहना है कि प्रशासन केवल नई ट्रेनों की घोषणाएं करता है, लेकिन जमीनी स्तर पर पुरानी और सफल ट्रेनों की क्षमता बढ़ाने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।

स्थानीय लोगों की प्रमुख मांगें:

  • अतिरिक्त कोच जोड़ना: यात्रियों की भीड़ को देखते हुए ट्रेन में तुरंत कम से कम 2-4 अतिरिक्त स्लीपर और जनरल कोच जोड़ने की मांग की गई है।

  • नई ट्रेनों का संचालन: श्रीगंगानगर से दिल्ली, जयपुर और दक्षिण भारत के लिए नई साप्ताहिक या दैनिक ट्रेनें शुरू की जाएं।

  • आधुनिकीकरण: 48 साल पुरानी इस सेवा को आधुनिक एलएचबी (LHB) कोच में तब्दील किया जाए ताकि यात्रा सुरक्षित और आरामदायक हो सके।

प्रशासन और भविष्य की राह

रेलवे के स्थानीय अधिकारियों का कहना है कि उच्च अधिकारियों को यात्रियों के भार और वेटिंग लिस्ट की स्थिति से अवगत करा दिया गया है। उत्तर पश्चिम रेलवे की ओर से समय-समय पर त्योहार स्पेशल ट्रेनें चलाई जाती हैं, लेकिन स्थानीय लोगों का तर्क है कि समस्या का समाधान अस्थायी ‘स्पेशल ट्रेनों’ से नहीं, बल्कि स्थाई व्यवस्था से होगा।

निष्कर्ष

किसी भी क्षेत्र के विकास के लिए सुदृढ़ परिवहन व्यवस्था अनिवार्य है। श्रीगंगानगर जैसा जिला, जो कृषि और व्यापार का केंद्र है, वहां 48 साल पुरानी ट्रेन पर इतना अधिक बोझ होना न केवल रेलवे की योजना पर सवाल उठाता है, बल्कि यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा के साथ भी समझौता है। यदि समय रहते नई ट्रेनों का संचालन और पुरानी ट्रेनों का विस्तार नहीं किया गया, तो आने वाले समय में रेल यात्रियों की मुश्किलें और अधिक विकराल रूप ले लेंगी।

अब देखना यह है कि क्या रेल मंत्रालय श्रीगंगानगर की इस पुरानी ‘धड़कन’ को अतिरिक्त ऑक्सीजन (कोच) देता है या यात्री इसी तरह संघर्ष करने को मजबूर रहेंगे।

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