
आज विश्व पशु चिकित्सा दिवस के अवसर पर श्रीगंगानगर सहित पूरे प्रदेश में विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। जहाँ एक ओर पशु चिकित्सकों के योगदान को सराहा गया, वहीं दूसरी ओर पशुपालकों, विशेषज्ञों और डेयरी संचालकों के बीच एक गंभीर चिंता का विषय छाया रहा—पशुगणना के आंकड़ों का सार्वजनिक न होना। पिछले दो वर्षों से नई पशुगणना के आधिकारिक आंकड़ों के अभाव में पशुपालन क्षेत्र एक तरह के ‘डेटा गैप’ से जूझ रहा है, जिसका सीधा असर सरकारी योजनाओं और स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहा है।
1. पशुगणना का महत्व और वर्तमान स्थिति
भारत में हर पांच साल में पशुगणना (Livestock Census) की जाती है। यह डेटा केवल संख्या बताने के लिए नहीं होता, बल्कि यह पशुपालन विभाग की रीढ़ होता है। पिछली पशुगणना के बाद अगली रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक हो जानी चाहिए थी, लेकिन प्रशासनिक देरी के कारण अभी भी विभाग पुराने आंकड़ों पर ही निर्भर है। विशेषज्ञों का कहना है कि दो साल पहले हुए सर्वे के बाद अब तक कई बदलाव आ चुके हैं—पशुओं की आबादी बढ़ी है, उनकी नस्लों में सुधार हुआ है और दुर्भाग्यवश ‘लम्पी’ जैसी बीमारियों के कारण बड़ी संख्या में पशुओं की मृत्यु भी हुई है।
2. आंकड़ों में देरी से उत्पन्न होने वाली प्रमुख समस्याएं
पशुगणना के आंकड़ों में देरी केवल सांख्यिकीय समस्या नहीं है, बल्कि इसके व्यावहारिक परिणाम बहुत गंभीर हैं:
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दवाओं और टीकों का गलत आकलन: सरकार पशुओं की संख्या के आधार पर ही दवाओं, टीकों और स्वास्थ्य किटों का बजट आवंटित करती है। यदि विभाग के पास सटीक संख्या ही नहीं है, तो मांग और आपूर्ति के बीच असंतुलन पैदा होता है। कई बार ग्रामीण क्षेत्रों के चिकित्सालयों में दवाएं कम पड़ जाती हैं क्योंकि वहां पशुओं की वास्तविक संख्या कागजी आंकड़ों से कहीं अधिक होती है।
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योजनाओं के क्रियान्वयन में बाधा: ‘कामधेनु बीमा योजना’ या नस्ल सुधार कार्यक्रमों जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ पात्र पशुपालकों तक पहुँचाने के लिए डेटा अनिवार्य है। सटीक डेटा के बिना बजट का आवंटन और लाभार्थियों का चयन पारदर्शी तरीके से करना मुश्किल हो जाता है।
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बीमारी नियंत्रण में कठिनाई: किसी भी महामारी (जैसे लम्पी या खुरपका-मुंहपका रोग) के समय रिंग वैक्सीनेशन के लिए यह जानना जरूरी है कि किस क्लस्टर में कितने पशु हैं। पुराने आंकड़ों के आधार पर बनाई गई रणनीति अक्सर जमीन पर विफल साबित होती है।
3. विशेषज्ञों और पशुपालकों की आवाज
आज के कार्यक्रम में स्थानीय प्रगतिशील पशुपालकों ने कड़े शब्दों में अपनी बात रखी। उनका कहना था कि जब सरकार ‘डिजिटल इंडिया’ की बात करती है, तो पशुगणना जैसे महत्वपूर्ण डेटा को सार्वजनिक करने में इतनी देरी क्यों? जिले के वरिष्ठ पशु चिकित्सा विशेषज्ञों ने बताया कि पशुगणना न होने से चारा उत्पादन और चरागाह विकास की योजनाओं पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
पशु चिकित्सालयों में आयोजित जागरूकता कार्यक्रमों में यह बात निकलकर आई कि डेटा की कमी के कारण अनुसंधान (Research) और नई तकनीकों के प्रयोग में भी बाधा आ रही है। निजी क्षेत्र की डेयरी कंपनियां भी निवेश करने से कतराती हैं क्योंकि उनके पास पशुओं की संख्या और दूध उत्पादन की क्षमता का सटीक रिकॉर्ड नहीं होता।
4. विश्व पशु चिकित्सा दिवस पर जागरूकता अभियान
इन चुनौतियों के बीच, जिले के विभिन्न सरकारी पशु चिकित्सालयों और उप-केंद्रों पर जागरूकता शिविर आयोजित किए गए।
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टीकाकरण: पशुपालकों को गर्मी के मौसम में होने वाली बीमारियों के प्रति सतर्क किया गया।
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पोषण: अत्यधिक गर्मी (हीटवेव) के दौरान पशुओं के आहार में बदलाव और उन्हें ठंडा रखने के उपायों पर चर्चा की गई।
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स्वच्छता: ‘एक स्वास्थ्य’ (One Health) अवधारणा के तहत बताया गया कि पशुओं की सेहत का सीधा संबंध मानव स्वास्थ्य से है।
5. निष्कर्ष और सरकार से मांग
विश्व पशु चिकित्सा दिवस का उद्देश्य केवल उत्सव मनाना नहीं, बल्कि उन बाधाओं को दूर करना भी है जो इस क्षेत्र के विकास को रोक रही हैं। श्रीगंगानगर के पशुपालक समाज और विशेषज्ञों की सरकार से पुरजोर मांग है कि:
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पशुगणना के आंकड़ों को तत्काल सार्वजनिक किया जाए।
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डेटा को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपडेट किया जाए ताकि रियल-टाइम जानकारी मिल सके।
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पशु चिकित्सा केंद्रों पर मैनपावर और संसाधनों की कमी को दूर किया जाए।
यदि सरकार जल्द ही नई पशुगणना के आंकड़े जारी नहीं करती है, तो भविष्य में पशुपालन आधारित अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। आज का दिन हमें याद दिलाता है कि पशु चिकित्सक समाज का एक अभिन्न हिस्सा हैं, लेकिन उन्हें अपना काम प्रभावी ढंग से करने के लिए सटीक डेटा और संसाधनों की आवश्यकता है।