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श्रीगंगानगर: इंसाफ के लिए 40 किलोमीटर का पैदल संघर्ष, ग्रामीणों ने घेरा एसपी कार्यालय

श्रीगंगानगर: राजस्थान के सीमावर्ती जिले श्रीगंगानगर में आज जन-आक्रोश की एक अभूतपूर्व तस्वीर देखने को मिली। जिले के एक दूरदराज गांव से सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण, जिनमें बुजुर्ग और युवा दोनों शामिल थे, 40 किलोमीटर का पैदल सफर तय कर जिला मुख्यालय पहुंचे। तपती धूप और पैरों में छालों की परवाह किए बिना इन ग्रामीणों ने पुलिस अधीक्षक (SP) कार्यालय का घेराव किया। यह प्रदर्शन स्थानीय पुलिस की कार्यप्रणाली और क्षेत्र में बढ़ती आपराधिक गतिविधियों के खिलाफ एक जोरदार चेतावनी थी।


आक्रोश की वजह: अनसुलझे अपराध और भय का माहौल

ग्रामीणों के इस बड़े आंदोलन के पीछे पिछले कुछ महीनों से क्षेत्र में हो रही लगातार आपराधिक घटनाएं हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि उनके गांव और आसपास के इलाकों में चोरी, लूटपाट और नशा तस्करी की घटनाएं चरम पर हैं। ग्रामीणों ने बताया कि हाल ही में हुई कुछ बड़ी चोरियों और एक किसान के साथ हुई मारपीट के मामले में स्थानीय पुलिस ने नामजद रिपोर्ट के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है।

प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे ग्रामीण प्रतिनिधियों ने कहा, “हम स्थानीय थाने के चक्कर काट-काट कर थक चुके हैं। वहां केवल आश्वासन मिलता है, कार्रवाई नहीं। अपराधी खुलेआम घूम रहे हैं और आम आदमी डर के साये में जीने को मजबूर है।”

40 किलोमीटर का कठिन सफर और अटूट जज्बा

यह पैदल मार्च कल देर रात गांव से शुरू हुआ था। ग्रामीणों ने पूरी रात पैदल सफर किया ताकि वे सुबह कार्यालय खुलते ही जिला मुख्यालय पहुंच सकें। आज जब श्रीगंगानगर का पारा 41°C के करीब था, तब भी इन ग्रामीणों का हौसला डगमगाया नहीं। हाथ में तख्तियां और बैनर लिए, ‘पुलिस प्रशासन मुर्दाबाद’ और ‘हमें न्याय दो’ के नारे लगाते हुए जब यह जत्था शहर की सीमा में दाखिल हुआ, तो हर कोई दंग रह गया।

रास्ते में कई जगहों पर सामाजिक संगठनों ने ग्रामीणों के लिए पानी और जलपान की व्यवस्था की, लेकिन ग्रामीणों का लक्ष्य सीधा एसपी ऑफिस था।


एसपी कार्यालय पर प्रदर्शन और वार्ता

जैसे ही ग्रामीण एसपी कार्यालय पहुंचे, वहां पहले से मौजूद भारी पुलिस बल ने उन्हें मुख्य गेट पर ही रोक दिया। इससे ग्रामीण और अधिक आक्रोशित हो गए और वहीं सड़क पर धरने पर बैठ गए। लगभग दो घंटे तक चले हंगामे और नारेबाजी के बाद, पुलिस अधीक्षक ने ग्रामीणों के एक प्रतिनिधिमंडल को वार्ता के लिए भीतर बुलाया।

ग्रामीणों की मुख्य मांगें:

  1. पिछले तीन महीनों में हुई सभी अनसुलझी चोरियों का खुलासा किया जाए।

  2. क्षेत्र में गश्त (Patrolling) बढ़ाई जाए और नशा तस्करों के खिलाफ सख्त अभियान चलाया जाए।

  3. स्थानीय थाना प्रभारी (SHO) की भूमिका की जांच हो, जिन पर लापरवाही के आरोप हैं।

  4. पीड़ित परिवारों को सुरक्षा प्रदान की जाए।

प्रशासन का आश्वासन

करीब एक घंटे तक चली वार्ता के बाद पुलिस अधीक्षक ने ग्रामीणों को आश्वस्त किया कि उनकी शिकायतों पर गंभीरता से विचार किया जाएगा। एसपी ने संबंधित थाना क्षेत्र के लिए एक विशेष टीम (SIT) गठित करने और पेंडिंग मामलों की रिपोर्ट 7 दिनों के भीतर देने का वादा किया। साथ ही, उन्होंने कहा कि अगर किसी पुलिसकर्मी की संलिप्तता या लापरवाही पाई गई, तो उस पर सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।


निष्कर्ष: तंत्र की विफलता या जनता का जागना?

यह प्रदर्शन इस बात का प्रतीक है कि जब ग्रामीण स्तर पर न्याय की उम्मीद खत्म होने लगती है, तो आम आदमी सड़कों पर उतरने को मजबूर हो जाता है। 40 किलोमीटर का पैदल मार्च करना कोई मामूली बात नहीं है, यह प्रशासन के प्रति जनता के गहरे अविश्वास को दर्शाता है।

हालांकि, एसपी के आश्वासन के बाद ग्रामीणों ने अपना धरना समाप्त कर दिया है, लेकिन उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि 10 दिनों के भीतर धरातल पर कोई बदलाव नहीं दिखा, तो वे इससे भी बड़ा आंदोलन करेंगे और इस बार चक्का जाम किया जाएगा। शाम होते-होते ग्रामीण वापस अपने गांव की ओर रवाना हुए, लेकिन उनके चेहरों पर इंसाफ की आस और व्यवस्था के प्रति नाराजगी साफ झलक रही थी।

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