
श्रीगंगानगर। राजस्थान के प्रमुख कृषि केंद्र श्रीगंगानगर में गेहूं की सरकारी खरीद का मुद्दा अब एक गंभीर गतिरोध का रूप ले चुका है। अप्रैल का महीना, जो मंडियों में रबी की फसल की बंपर आवक और रौनक के लिए जाना जाता था, इस बार विरोध प्रदर्शनों, बंद शटरों और किसानों की चिंता भरी आवाजों से गूंज रहा है। राज्य सरकार द्वारा गेहूं की खरीद व्यवस्था में किए गए हालिया बदलावों ने व्यापारियों और सरकार के बीच एक ऐसी दीवार खड़ी कर दी है, जिसका सीधा खामियाजा जिले का अन्नदाता भुगत रहा है।
विवाद की जड़: व्यवस्था में बदलाव और व्यापारियों का रुख
इस वर्ष प्रशासन ने गेहूं की खरीद प्रक्रिया को और अधिक डिजिटल और पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से कुछ नए नियम लागू किए हैं। इनमें भुगतान की सीधी प्रक्रिया (Direct Benefit Transfer) और खरीद पोर्टल पर पंजीकरण की अनिवार्यताओं में कुछ तकनीकी संशोधन शामिल हैं।
हालांकि, ट्रेडर्स एसोसिएशन और कच्चा आढ़तिया संघ इन बदलावों को व्यावहारिक नहीं मान रहे हैं। व्यापारियों का तर्क है कि:
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आढ़त प्रणाली पर प्रहार: नए नियमों से वर्षों से चली आ रही आढ़त (कमीशन) व्यवस्था प्रभावित हो रही है, जिससे उनके व्यापारिक अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है।
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लिफ्टिंग की समस्या: मंडियों में गेहूं की खरीद के बाद उसे गोदामों तक पहुंचाने (लिफ्टिंग) की गति अत्यंत धीमी है। इससे मंडियों में माल का अंबार लग गया है और नई फसल उतारने के लिए जगह नहीं बची है।
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भुगतान में देरी: तकनीकी दिक्कतों के कारण किसानों के खातों में समय पर पैसा नहीं पहुंच पा रहा है, जिसका दोष अक्सर व्यापारियों पर मढ़ा जाता है।
इन मांगों को लेकर व्यापारिक संगठनों ने कड़ा रुख अपनाते हुए मंडियों में कार्य बहिष्कार का ऐलान कर रखा है। आज भी जिले की प्रमुख अनाज मंडियों में सन्नाटा पसरा रहा और खरीद का कार्य पूरी तरह ठप नजर आया।
किसान: दोहरी मार का शिकार
इस पूरे विवाद में सबसे ज्यादा परेशान जिले का किसान है। एक तरफ प्रकृति का अनिश्चित मिजाज और दूसरी तरफ मंडियों का यह गतिरोध किसानों के लिए ‘कोढ़ में खाज’ जैसा साबित हो रहा है।
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सुरक्षा का अभाव: किसान अपनी मेहनत की कमाई (गेहूं) लेकर मंडी तो पहुंच रहे हैं, लेकिन खरीद न होने के कारण उन्हें खुले आसमान के नीचे रातें काटनी पड़ रही हैं। बिना लिफ्टिंग के फसल के चोरी होने या अचानक बारिश में भीगने का डर बना रहता है।
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आर्थिक तंगी: अप्रैल का महीना किसानों के लिए अगली फसल की तैयारी और घरेलू खर्चों (शादी-ब्याह आदि) का समय होता है। फसल न बिकने के कारण उनके पास नगदी की भारी किल्लत हो गई है।
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उचित मूल्य की मांग: किसान संगठन न केवल सुचारू खरीद की मांग कर रहे हैं, बल्कि बोनस और एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर सख्ती से अमल की भी गुहार लगा रहे हैं।
प्रशासनिक प्रयास और वर्तमान स्थिति
जिला प्रशासन और खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग के अधिकारियों ने व्यापारियों के साथ कई दौर की वार्ता की है, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया है। प्रशासन का कहना है कि सरकार के नियम किसानों के हित में हैं और व्यापारियों को सहयोग करना चाहिए। वहीं, व्यापारियों का कहना है कि जब तक उनकी व्यवहारिक समस्याओं का समाधान नहीं होता, वे हड़ताल खत्म नहीं करेंगे।
आज 10 अप्रैल को स्थिति यह है कि श्रीगंगानगर, पदमपुर, रायसिंहनगर और घड़साना जैसी बड़ी मंडियों में गेहूं की बोरियां धूल फांक रही हैं। यदि अगले 24 से 48 घंटों में कोई बीच का रास्ता नहीं निकाला गया, तो मंडियों में जाम की स्थिति पैदा हो जाएगी और किसान सड़कों पर उतरने को मजबूर हो सकते हैं।
निष्कर्ष और आगे की राह
श्रीगंगानगर की अर्थव्यवस्था पूरी तरह कृषि पर टिकी है। गेहूं की खरीद में यह असमंजस न केवल व्यापारिक समुदाय के लिए नुकसानदेह है, बल्कि यह जिले की आर्थिक रफ्तार को भी रोक रहा है। सरकार को चाहिए कि वह व्यापारियों की तकनीकी आपत्तियों को गंभीरता से सुने और किसानों के हितों को सर्वोपरि रखते हुए मध्यस्थता का कोई रास्ता निकाले। सुचारू लिफ्टिंग और समय पर भुगतान ही इस संकट का एकमात्र समाधान है। जब तक मंडियों में ‘कांटा’ फिर से शुरू नहीं होता, तब तक अन्नदाता की आंखों की नमी कम होना मुश्किल है।