
नई दिल्ली, 5 मार्च 2026
‘वर्ल्ड ओबेसिटी फेडरेशन’ द्वारा कल जारी की गई “विश्व मोटापा एटलस 2026” ने भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य भविष्य को लेकर एक गंभीर खतरे की घंटी बजा दी है। रिपोर्ट के चौंकाने वाले आंकड़ों के अनुसार, भारत अब बचपन के मोटापे (Childhood Obesity) के मामले में चीन के बाद दुनिया में दूसरे स्थान पर पहुंच गया है। यह स्थिति न केवल एक स्वास्थ्य चुनौती है, बल्कि देश के भविष्य की कार्यक्षमता और आर्थिक विकास के लिए भी एक बड़ा अवरोध साबित हो सकती है।
आंकड़ों की जुबानी: भारत के लिए चिंताजनक संकेत
रिपोर्ट में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि भारत में बच्चों और किशोरों में मोटापे की दर 5% प्रति वर्ष की खतरनाक गति से बढ़ रही है। यह वृद्धि दर कई विकसित देशों की तुलना में भी अधिक है।
एटलस 2026 के अनुसार, यदि इसी गति से मोटापा बढ़ता रहा, तो 2035 तक भारत में करोड़ों बच्चे ‘ओवरवेट’ की श्रेणी में होंगे। वर्तमान में शहरी क्षेत्रों के स्कूलों में हर पांच में से एक बच्चा मोटापे का शिकार पाया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल “खाते-पीते घर की निशानी” नहीं है, बल्कि एक गंभीर चयापचय संबंधी (Metabolic) विकार है।
क्यों बढ़ रहा है भारत में मोटापा?
रिपोर्ट में भारत में इस संकट के पीछे तीन प्रमुख कारणों को रेखांकित किया गया है:
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अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का बढ़ता चलन: जंक फूड, मीठे पेय पदार्थ (Sugar-sweetened beverages) और पैकेट बंद स्नैक्स की आसान उपलब्धता और उनके लुभावने विज्ञापनों ने बच्चों की खाने की आदतों को बिगाड़ दिया है।
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शारीरिक सक्रियता में कमी: डिजिटल क्रांति के कारण बच्चे अब खेल के मैदानों के बजाय स्मार्टफोन, टैबलेट और वीडियो गेम्स पर अधिक समय बिता रहे हैं। इसे ‘सेडेंटरी लाइफस्टाइल’ (Sedentary Lifestyle) कहा जाता है, जो कैलोरी बर्न करने के अवसरों को कम कर देता है।
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नींद की कमी और तनाव: बढ़ते शैक्षणिक दबाव और स्क्रीन टाइम के कारण बच्चों की नींद पूरी नहीं हो रही है, जिससे शरीर में हॉर्मोनल असंतुलन पैदा होता है और वजन बढ़ता है।
भविष्य के स्वास्थ्य पर मंडराता खतरा
बचपन का मोटापा केवल बचपन तक सीमित नहीं रहता। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि जो बच्चे आज मोटापे से ग्रस्त हैं, उनमें वयस्क होने पर निम्नलिखित बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है:
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टाइप-2 मधुमेह (Diabetes): भारत को पहले ही ‘विश्व की मधुमेह राजधानी’ कहा जाता है। कम उम्र में मोटापा इस स्थिति को और भयावह बना रहा है।
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हृदय रोग (Cardiovascular Diseases): कम उम्र में ही उच्च रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल की समस्या देखी जा रही है।
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मानसिक स्वास्थ्य: मोटापे से ग्रस्त बच्चों को अक्सर स्कूल में ‘बुलिंग’ (Bullying) और कम आत्मविश्वास का सामना करना पड़ता है, जिससे वे अवसाद (Depression) का शिकार हो सकते हैं।
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समाधान की दिशा में कदम: ‘हेल्थ फर्स्ट’ की नीति
वर्ल्ड ओबेसिटी फेडरेशन ने भारत सरकार और समाज के लिए कुछ कड़े सुझाव दिए हैं:
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स्कूलों में जंक फूड पर प्रतिबंध: स्कूल कैंटीन में उच्च वसा और चीनी वाले खाद्य पदार्थों की बिक्री को नियंत्रित करना।
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फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग (FOPL): खाद्य पदार्थों के पैकेट पर स्पष्ट चेतावनी होनी चाहिए कि उसमें कितनी चीनी या वसा है।
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अनिवार्य खेलकूद: शिक्षा नीति में शारीरिक शिक्षा (Physical Education) को गणित या विज्ञान जितना ही महत्व देना अनिवार्य है।
निष्कर्ष
विश्व मोटापा एटलस 2026 की यह रिपोर्ट भारत के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ है। 5 मार्च की यह खबर हमें याद दिलाती है कि एक स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण केवल अस्पतालों से नहीं, बल्कि बच्चों की थाली और उनके खेल के मैदानों से शुरू होता है। यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो भारत की अगली पीढ़ी बीमारियों के भारी बोझ तले दब सकती है।