
भारत में स्वास्थ्य सेवाओं को सस्ता और सुलभ बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। केंद्रीय बजट 2026-27 के हालिया प्रस्तावों के तहत, सरकार ने 17 महत्वपूर्ण कैंसर रोधी दवाओं (Anti-Cancer Drugs) पर लगने वाली बेसिक कस्टम ड्यूटी को पूरी तरह से हटाने का निर्णय लिया है। यह फैसला उन लाखों परिवारों के लिए एक नई उम्मीद की किरण बनकर आया है, जो कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी के महंगे इलाज के बोझ तले दबे हुए थे।
प्रमुख दवाएं और उनकी महत्ता
इस कटौती के दायरे में कई ऐसी दवाएं शामिल हैं जिनका वर्तमान में कोई घरेलू विकल्प मौजूद नहीं है और जिन्हें विदेशों से आयात करना पड़ता है। इनमें प्रमुख नाम हैं:
-
रिबोसिक्लिब (Ribociclib): यह मुख्य रूप से ब्रेस्ट कैंसर के उन्नत चरणों के इलाज में उपयोग की जाती है।
-
ब्रिगाटिनिब (Brigatinib): यह फेफड़ों के कैंसर (Non-Small Cell Lung Cancer) के मरीजों के लिए एक महत्वपूर्ण दवा है।
इन दवाओं पर अब तक भारी सीमा शुल्क (Custom Duty) लगता था, जिससे इनकी एमआरपी (MRP) आम आदमी की पहुंच से बाहर हो जाती थी।
मरीजों की जेब पर क्या होगा असर?
कस्टम ड्यूटी हटने का सीधा प्रभाव इन दवाओं की अंतिम कीमत पर पड़ेगा। विशेषज्ञों और दवा बाजार के विश्लेषकों का अनुमान है कि:
-
कीमतों में गिरावट: विदेशी दवाओं की कीमतों में तत्काल प्रभाव से 10% से 12% तक की कमी आएगी।
-
मध्यम वर्ग को लाभ: भारत में कैंसर का इलाज अक्सर परिवारों को कर्ज के जाल में धकेल देता है। दवाओं के दाम गिरने से मध्यम और निम्न आय वर्ग के मरीजों के लिए इलाज जारी रखना अब अधिक किफायती होगा।
-
पहुंच में सुधार: जब दवाएं सस्ती होंगी, तो अधिक से अधिक अस्पताल और फार्मेसी इनका स्टॉक रख सकेंगे, जिससे मरीजों को ये दवाएं आसानी से उपलब्ध हो पाएंगी।
कैंसर के उपचार का आर्थिक ढांचा
भारत में कैंसर उपचार का खर्च काफी हद तक दवाओं के आयात पर निर्भर करता है। नीचे दिए गए चार्ट के माध्यम से समझिए कि दवाओं की लागत उपचार के कुल खर्च को कैसे प्रभावित करती है:
सरकार का दीर्घकालिक दृष्टिकोण
यह निर्णय केवल कर कटौती तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकार की व्यापक स्वास्थ्य रणनीति का हिस्सा है:
-
आयुष्मान भारत का समर्थन: बजट में कैंसर उपचार के लिए आयुष्मान भारत योजना के दायरे को भी बढ़ाया गया है। सस्ती दवाएं इस योजना के तहत सरकार पर पड़ने वाले वित्तीय बोझ को भी कम करेंगी।
-
मेक इन इंडिया को प्रोत्साहन: जहां एक तरफ आयातित दवाओं पर ड्यूटी घटाई गई है, वहीं सरकार घरेलू फार्मा कंपनियों को कैंसर की ‘जेनेरिक’ दवाएं बनाने के लिए अनुसंधान (R&D) ग्रांट भी दे रही है।
-
अर्ली डिटेक्शन (जल्द पहचान): दवाओं को सस्ता करने के साथ-साथ सरकार देश भर में ‘कैंसर स्क्रीनिंग सेंटर’ का जाल बिछा रही है ताकि शुरुआती चरण में ही बीमारी पकड़ी जा सके।
चुनौतियां और आगे की राह
हालांकि ड्यूटी कम करना एक बड़ा कदम है, लेकिन चुनौतियां अभी भी बरकरार हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि फार्मा कंपनियां इस टैक्स कटौती का पूरा लाभ सीधे मरीजों तक पहुंचाएं और बीच के बिचौलिए इस मार्जिन को न खा जाएं।
निष्कर्ष: 17 कैंसर दवाओं पर कस्टम ड्यूटी खत्म करना भारत की स्वास्थ्य नीति में एक ‘गेम-चेंजर’ साबित हो सकता है। यह कदम न केवल इलाज के खर्च को कम करेगा, बल्कि कैंसर के खिलाफ लड़ाई में देश के संकल्प को भी मजबूत करेगा। अब एक आम भारतीय नागरिक को इलाज के लिए अपनी जमीन या गहने बेचने की जरूरत नहीं पड़ेगी।