
श्रीगंगानगर। राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले को “राजस्थान का अन्न भंडार” कहा जाता है, लेकिन आज यहाँ से एक ऐसी खबर निकलकर सामने आ रही है जो केवल अनाज उत्पादन के बारे में नहीं, बल्कि आने वाली नस्लों को संस्कारित करने के बारे में है। पदमपुर बेल्ट के एक छोटे से गाँव के 70 वर्षीय किसान, श्री हरनाम सिंह ने अपनी उम्र के इस पड़ाव पर आराम करने के बजाय एक ऐसी मशाल जलाई है, जिसकी रोशनी पूरे जिले में फैल रही है। उन्होंने अपने लहलहाते खेत के एक बड़े हिस्से को ‘खेत पाठशाला’ में तब्दील कर दिया है।
क्या है यह ‘खेत पाठशाला’ और क्यों हुई इसकी शुरुआत?
हरनाम सिंह की ‘खेत पाठशाला’ कोई ईंट-गारे की इमारत नहीं है। यहाँ न तो ब्लैकबोर्ड हैं और न ही कुर्सियाँ। यहाँ की बेंचें मिट्टी की मुंडेरें हैं और छत खुला आसमान है। हरनाम सिंह का मानना है कि आधुनिक दौर का युवा ‘क्लिक’ की दुनिया में इतना खो गया है कि उसे यह भी नहीं पता कि उसके भोजन का स्रोत क्या है।
4 फरवरी को आयोजित एक विशेष सत्र के दौरान, जब शहर के लगभग 50 स्कूली छात्र वहाँ पहुँचे, तो हरनाम सिंह ने उन्हें किताबों से बाहर निकालकर सीधे प्रकृति की गोद में बिठाया। उन्होंने बच्चों को समझाया कि खेती केवल पसीना बहाना नहीं, बल्कि एक विज्ञान और कला का संगम है।
प्रायोगिक ज्ञान: रसायनों से दूर, प्रकृति के करीब
आजकल की खेती में बढ़ते रसायनों और कीटनाशकों के प्रयोग से हरनाम सिंह चिंतित हैं। अपनी पाठशाला में वे बच्चों को ‘प्राकृतिक खेती’ (Natural Farming) का महत्व समझा रहे हैं।
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जैविक खाद का जादू: बच्चों ने अपने हाथों से गोबर खाद और कचरे से तैयार जैविक खाद बनाना सीखा। हरनाम सिंह ने उन्हें दिखाया कि कैसे बिना किसी जहरीले रसायन के भी सब्जियां और अनाज लहलहा सकते हैं।
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मिट्टी की धड़कन पहचानना: छात्रों को मिट्टी के पीएच ($pH$) मान और नमी की जांच करने के सरल देसी और आधुनिक तरीके सिखाए गए। बच्चों के लिए यह किसी जादुई प्रयोग से कम नहीं था कि कैसे मिट्टी का सही संतुलन फसल की किस्मत बदल सकता है।
एग्रो-टूरिज्म और लाइव लर्निंग का संगम
यह खबर इसलिए अनोखी है क्योंकि जहाँ लोग रिटायरमेंट के बाद शहर की ओर भागते हैं, वहीं हरनाम सिंह ने शहर को गाँव की ओर खींच लिया है। यह पहल ‘एग्रो-टूरिज्म’ का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करती है। हरनाम सिंह कहते हैं, “अगर आने वाली पीढ़ी को यह नहीं पता होगा कि उनकी थाली में आने वाली रोटी कैसे उगती है, तो हम भविष्य में तकनीक पाकर भी भूखे रह जाएंगे। मेरा मकसद केवल पढ़ाना नहीं, उन्हें उनकी जड़ों से जोड़ना है।”
बिना फीस की पाठशाला, बस एक संकल्प
इस पाठशाला की सबसे दिल छू लेने वाली बात इसकी ‘फीस’ है। हरनाम सिंह किसी से पैसा नहीं लेते। उनकी एकमात्र शर्त यह है कि जो भी बच्चा यहाँ से सीखकर जाएगा, वह अपने घर या स्कूल में एक पौधा लगाएगा और उसके पेड़ बनने तक उसकी देखभाल करेगा। यह ‘वृक्षारोपण’ ही उनकी गुरुदक्षिणा है।
प्रशासनिक सराहना और भविष्य की राह
इस पहल की गूँज जिला प्रशासन और कृषि विभाग तक पहुँच चुकी है। स्थानीय अधिकारियों ने 4 फरवरी के सत्र का अवलोकन किया और हरनाम सिंह को सम्मानित करने की घोषणा की। विभाग अब इस मॉडल को जिले के अन्य हिस्सों में भी लागू करने पर विचार कर रहा है, ताकि श्रीगंगानगर के अन्य प्रगतिशील किसान भी अपनी विरासत को युवाओं के साथ साझा कर सकें।
निष्कर्ष:
हरनाम सिंह की यह ‘खेत पाठशाला’ साबित करती है कि परिवर्तन लाने के लिए किसी बड़े बजट की नहीं, बल्कि एक नेक सोच और अटूट जज्बे की जरूरत होती है। आज श्रीगंगानगर केवल गेहूं और कपास की फसल ही नहीं उगा रहा, बल्कि हरनाम सिंह जैसे दूरदर्शी किसानों की बदौलत ‘संस्कारों और ज्ञान’ की एक नई पौध भी तैयार कर रहा है।