
नई दिल्ली: स्ट्रोक एक ऐसी स्थिति है जिसमें मस्तिष्क के किसी हिस्से में रक्त की आपूर्ति बाधित हो जाती है, जिससे पैरालिसिस (लकवा) या बोलने और समझने में कठिनाई हो सकती है। एम्स दिल्ली के न्यूरोलॉजी विभाग द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया है कि जो मरीज उपचार के दौरान नियमित रूप से धूप के संपर्क में रहे, उनकी रिकवरी दर अन्य मरीजों की तुलना में 25-30% अधिक तेज थी।
1. वैज्ञानिक आधार: ‘सर्केडियन रिदम’ का सुधार
स्ट्रोक के मरीज अक्सर अस्पताल के बंद कमरों या घर के भीतर लंबे समय तक रहते हैं। इससे उनका ‘सर्केडियन रिदम’ (शरीर की आंतरिक घड़ी) बिगड़ जाता है।
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नींद का चक्र: सूर्य की रोशनी आंखों के माध्यम से मस्तिष्क को संकेत भेजती है, जिससे मेलाटोनिन (नींद का हार्मोन) का स्तर नियंत्रित होता है।
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विटामिन D का संचार: धूप से मिलने वाला विटामिन D हड्डियों को मजबूत करने के साथ-साथ न्यूरोप्रोटेक्टिव (मस्तिष्क की कोशिकाओं की रक्षा करने वाला) गुण भी रखता है।
2. मानसिक स्वास्थ्य और सेरोटोनिन
स्ट्रोक के बाद लगभग 30-40% मरीज ‘पोस्ट-स्ट्रोक डिप्रेशन’ का शिकार होते हैं।
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धूप के संपर्क में आने से मस्तिष्क में सेरोटोनिन (हैप्पी हार्मोन) का स्तर बढ़ता है।
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जब मरीज मानसिक रूप से खुश और तनावमुक्त होता है, तो उसकी फिजियोथेरेपी (Physiotherapy) और एक्सरसाइज करने की इच्छाशक्ति बढ़ जाती है, जो शारीरिक रिकवरी के लिए अनिवार्य है।
3. ‘सनलाइट थेरेपी’ का तरीका: कब और कितनी देर?
एम्स के शोधकर्ताओं ने इस थेरेपी के लिए कुछ मानक भी सुझाए हैं:
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समय: सुबह की पहली धूप (सूर्योदय के 1-2 घंटे के भीतर) सबसे प्रभावी मानी गई है क्योंकि इसमें हानिकारक UV किरणें कम होती हैं।
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अवधि: रोजाना 20 से 30 मिनट तक शरीर के कुछ हिस्सों (जैसे हाथ और पैर) का धूप के सीधे संपर्क में आना पर्याप्त है।
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स्थान: अस्पताल के पार्कों या घर की बालकनी में बैठकर शांत वातावरण का आनंद लेना रिकवरी को दोगुना कर देता है।
4. किफायती और सुलभ समाधान
जहाँ आधुनिक न्यूरो-रिहैबिलिटेशन सेंटर लाखों रुपये चार्ज करते हैं, वहीं ‘सनलाइट थेरेपी’ पूरी तरह निशुल्क है। यह उन मध्यम और निम्न-आय वाले परिवारों के लिए एक वरदान है जो महंगे सप्लीमेंट्स या लंबी थेरेपी का खर्च वहन नहीं कर सकते। एम्स अब अपने वार्डों के डिजाइन में भी बदलाव करने पर विचार कर रहा है ताकि अधिक से अधिक प्राकृतिक रोशनी अंदर आ सके।
निष्कर्ष: प्रकृति की ओर वापसी
एम्स दिल्ली का यह अध्ययन साबित करता है कि आधुनिक चिकित्सा और प्राकृतिक उपचार का समन्वय ही सर्वोत्तम परिणाम देता है। स्ट्रोक केवल एक शारीरिक बीमारी नहीं है, यह मरीज को मानसिक रूप से भी तोड़ देती है। ऐसे में सूरज की किरणें न केवल शरीर को ठीक करती हैं, बल्कि मरीज के जीवन में आशा की नई किरण भी जगाती हैं।
सावधानी: मरीजों को सीधे कड़ी दोपहर की धूप में बैठने से बचना चाहिए और यदि त्वचा संबंधी कोई एलर्जी है, तो डॉक्टर से परामर्श अवश्य लेना चाहिए।