
रांची, 20 जनवरी 2026: झारखंड को ‘हाथीपांव’ (Lymphatic Filariasis) मुक्त बनाने की दिशा में राज्य सरकार ने आज एक निर्णायक युद्ध का शंखनाद कर दिया है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा घोषित ‘मिशन मोड’ अभियान का उद्देश्य राज्य के 14 सबसे अधिक प्रभावित जिलों से इस दर्दनाक बीमारी का नामोनिशान मिटाना है। 10 फरवरी 2026 से शुरू होने वाला यह महा-अभियान केवल एक स्वास्थ्य कार्यक्रम नहीं, बल्कि झारखंड के लाखों नागरिकों के भविष्य को सुरक्षित करने की एक सामाजिक प्रतिज्ञा है।
अभियान की विशालता: 1.75 करोड़ लोगों तक पहुँच
झारखंड के 14 उच्च जोखिम वाले जिलों (High-Risk Districts) को इस बार केंद्र बिंदु में रखा गया है। सरकार ने इसके लिए सामूहिक दवा सेवन (Mass Drug Administration – MDA) का लक्ष्य निर्धारित किया है।
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लक्ष्य: राज्य की लगभग 1.75 करोड़ आबादी को एक साथ फाइलेरिया रोधी दवा खिलाई जाएगी।
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मिशन स्क्वॉड: इस विशाल कार्य को अंजाम देने के लिए 230 विशेष ‘मिशन स्क्वॉड’ और हजारों स्वास्थ्य कर्मियों (सहिया, आशा कार्यकर्ता और आंगनवाड़ी सेविकाएं) को प्रशिक्षित किया गया है।
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निगरानी का स्तर: यह टीमें न केवल दवा वितरण करेंगी, बल्कि यह भी सुनिश्चित करेंगी कि लाभार्थी उनके सामने ही दवा का सेवन करें (Directly Observed Therapy)।
फाइलेरिया (हाथीपांव) को समझना क्यों जरूरी है?
फाइलेरिया एक परजीवी बीमारी है जो संक्रमित मच्छरों (क्युलेक्स मच्छर) के काटने से फैलती है।
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छुपा हुआ खतरा: इस बीमारी के लक्षण दिखने में 5 से 15 साल तक लग सकते हैं। शरीर के अंदर परजीवी लसीका प्रणाली (Lymphatic System) को नुकसान पहुँचाते रहते हैं।
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स्थायी विकलांगता: एक बार जब पैर या हाथ सूजकर हाथी के पैर जैसे (Elephantiasis) हो जाते हैं, तो इसे पूरी तरह ठीक करना लगभग असंभव होता है।
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सामाजिक कलंक: पीड़ित व्यक्ति अक्सर चलने-फिरने में असमर्थ हो जाता है और उसे मानसिक और सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
रणनीति: ‘बूथ से घर-घर तक’
झारखंड सरकार ने इस बार ‘ट्रिपल ड्रग थेरेपी’ (IDA) का उपयोग करने का निर्णय लिया है, जिसमें तीन दवाओं (आइवरमेक्टिन, डीईसी और एल्बेंडाजोल) का संयोजन दिया जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह संयोजन फाइलेरिया के परजीवियों को खत्म करने में सामान्य दवाओं की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी है।
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शिक्षा और जागरूकता: नुक्कड़ नाटकों, रेडियो संदेशों और स्कूल रैलियों के माध्यम से ‘दवा से डर’ को खत्म करने का प्रयास किया जा रहा है।
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प्रतिकूल घटना प्रबंधन: दवा खाने के बाद मामूली जी मिचलाना या चक्कर आना इस बात का संकेत है कि दवा शरीर में मौजूद कीड़ों को मार रही है। इसके प्रबंधन के लिए प्रत्येक ब्लॉक स्तर पर रैपिड रिस्पांस टीमें तैनात रहेंगी।
निष्कर्ष: जनभागीदारी ही सफलता की कुंजी
झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री ने स्पष्ट किया है कि सरकार केवल दवा उपलब्ध करा सकती है, लेकिन बीमारी को खत्म करने की जिम्मेदारी जनता की है। फाइलेरिया का कोई इलाज नहीं है, लेकिन ‘एक खुराक’ से इसका बचाव शत-प्रतिशत संभव है। 10 फरवरी से शुरू होने वाला यह अभियान झारखंड को ‘विकलांगता मुक्त’ प्रदेश बनाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम साबित होगा।