
राजस्थान के सीमावर्ती जिले श्रीगंगानगर से एक ऐसा बैंकिंग घोटाला सामने आया है जिसने न केवल प्रदेश, बल्कि पूरे देश के बैंकिंग और सुरक्षा तंत्र को हिलाकर रख दिया है। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने पंजाब एंड सिंध बैंक की स्थानीय शाखाओं में हुए 1,621 करोड़ रुपये के बड़े वित्तीय फर्जीवाड़े का खुलासा किया है। इस मामले में बैंक के पूर्व अधिकारियों और बाहरी साइबर अपराधियों की मिलीभगत की बात सामने आ रही है।
घोटाले की कार्यप्रणाली: ‘म्यूल अकाउंट्स’ का खेल
जांच में यह तथ्य सामने आया है कि यह कोई साधारण धोखाधड़ी नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित साइबर-क्राइम सिंडिकेट का काम था। घोटाले की मुख्य धुरी 17 ‘म्यूल अकाउंट’ (Mule Accounts) थे।
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फर्जी दस्तावेज: ये खाते पूरी तरह से फर्जी केवाईसी (KYC) दस्तावेजों, जाली आईडी और गलत पतों के आधार पर खोले गए थे।
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अधिकारियों की भूमिका: सीबीआई की प्राथमिकी (FIR) के अनुसार, तत्कालीन बैंक प्रबंधकों और स्टाफ ने जानबूझकर इन दस्तावेजों की भौतिक जांच नहीं की और बैंकिंग नियमों को ताक पर रखकर खाते सक्रिय किए।
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लेनदेन का तरीका: इन 17 खातों में बहुत ही कम समय में करोड़ों रुपये के सैकड़ों ट्रांजेक्शन किए गए। यह पैसा अक्सर साइबर ठगी, फिशिंग और अवैध सट्टेबाजी जैसे संदिग्ध स्रोतों से आता था और फिर तुरंत दूसरे खातों में ट्रांसफर कर दिया जाता था।
सीबीआई की कार्रवाई और एफआईआर
बैंक की आंतरिक सतर्कता इकाई द्वारा रिपोर्ट किए जाने के बाद मामला सीबीआई को सौंपा गया। सीबीआई ने अपनी जांच में पाया कि:
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बैंक प्रबंधकों ने संदिग्ध लेनदेन की सूचना फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट (FIU) को नहीं दी।
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खाते खोलने की प्रक्रिया में बैंक के सॉफ्टवेयर और सुरक्षा प्रोटोकॉल के साथ छेड़छाड़ की गई।
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कई मामलों में, बैंक अधिकारियों के लॉगिन क्रेडेंशियल का उपयोग करके अवैध तरीके से डेटा एंट्री की गई।
बैंकिंग क्षेत्र और स्थानीय स्तर पर प्रभाव
इस खुलासे ने श्रीगंगानगर के बैंकिंग सेक्टर में विश्वास का संकट पैदा कर दिया है। 1,621 करोड़ रुपये की यह राशि इतनी बड़ी है कि इसने जिला प्रशासन और प्रवर्तन एजेंसियों को सतर्क कर दिया है। पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को संदेह है कि इन खातों का इस्तेमाल मनी लॉन्ड्रिंग या राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के वित्तपोषण के लिए भी किया गया हो सकता है, क्योंकि श्रीगंगानगर एक संवेदनशील सीमावर्ती इलाका है।
वर्तमान स्थिति और जांच का दायरा
वर्तमान में, सीबीआई उन व्यक्तियों की पहचान करने में जुटी है जिनके पास इन खातों का अंतिम नियंत्रण था। बैंक के उन पूर्व प्रबंधकों से पूछताछ की जा रही है जिनके कार्यकाल में ये खाते खुले।
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आईटी ऑडिट: बैंक के सर्वर का फॉरेंसिक ऑडिट किया जा रहा है ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या कोई बाहरी हैकर बैंक के सिस्टम में घुसा था।
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संपत्ति की कुर्की: प्रवर्तन निदेशालय (ED) भी इस मामले में धन शोधन (Money Laundering) के कोण से शामिल हो सकता है, जिससे आरोपियों की संपत्तियां कुर्क की जा सकें।
निष्कर्ष: यह घटना बैंकिंग सुरक्षा प्रणालियों में मौजूद खामियों को उजागर करती है। यह याद दिलाता है कि डिजिटल बैंकिंग के युग में ‘केवाईसी’ प्रक्रियाओं का पालन करना कितना अनिवार्य है। श्रीगंगानगर के इस घोटाले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जब आंतरिक बैंकिंग कर्मचारी अपराधियों से मिल जाते हैं, तो अर्थव्यवस्था को अपूरणीय क्षति पहुँचती है।