
न्यूयॉर्क/बर्लिन। चिकित्सा जगत के इतिहास में वर्ष 2026 को एक ऐसे मोड़ के रूप में देखा जा रहा है, जिसने घातक बीमारियों के विरुद्ध मनुष्य की लड़ाई की दिशा बदल दी है। जिस mRNA (मैसेंजर आरएनए) तकनीक ने दुनिया को कोविड-19 महामारी से उबारा था, अब वह कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी के लिए ‘ब्रह्मास्त्र’ बनकर उभरी है। अमेरिका और जर्मनी के वैज्ञानिकों ने इस दिशा में बड़ी सफलता हासिल की है, जिससे कैंसर का इलाज अब केवल कीमोथेरेपी तक सीमित नहीं रहेगा।
क्या है mRNA तकनीक और यह कैंसर पर कैसे काम करती है?
पारंपरिक उपचारों (जैसे कीमोथेरेपी) में दवाएं शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं और कैंसर कोशिकाओं, दोनों को प्रभावित करती हैं, जिससे बाल झड़ना और कमजोरी जैसे गंभीर साइड इफेक्ट्स होते हैं। लेकिन mRNA तकनीक एक ‘पर्सनलाइज्ड वैक्सीन’ की तरह काम करती है।
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निर्देशवाहक प्रणाली: mRNA तकनीक शरीर की अपनी कोशिकाओं को यह निर्देश देती है कि वे कैंसर कोशिकाओं की पहचान कैसे करें। यह शरीर के इम्यून सिस्टम (रोग प्रतिरोधक क्षमता) को एक विशिष्ट ‘कोड’ प्रदान करता है, जिससे प्रतिरक्षा कोशिकाएं (T-cells) केवल कैंसर की गांठों को खोजकर उन्हें नष्ट कर देती हैं।
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सटीकता (Precision): यह तकनीक सीधे कैंसर कोशिकाओं के जेनेटिक म्यूटेशन पर हमला करती है, जिससे स्वस्थ कोशिकाओं को कोई नुकसान नहीं पहुँचता।
2026: क्लिनिकल ट्रायल का अंतिम चरण
वर्तमान में, अमेरिका और जर्मनी की दिग्गज बायोफार्मास्युटिकल कंपनियां फेफड़ों (Lung Cancer) और कोलोरेक्टल (Colorectal Cancer) कैंसर के लिए अपनी mRNA दवाओं के तीसरे चरण (Phase 3) के परीक्षण को पूरा कर रही हैं।
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फेफड़ों का कैंसर: शुरुआती परिणामों में देखा गया है कि जो मरीज अन्य उपचारों पर प्रतिक्रिया नहीं दे रहे थे, उनकी ट्यूमर साइज में 40% तक की कमी आई है।
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दुर्लभ बीमारियां: कैंसर के अलावा, इस तकनीक का परीक्षण कुछ ऐसी जेनेटिक बीमारियों के लिए भी किया जा रहा है जिन्हें अब तक ‘असाध्य’ माना जाता था।
इलाज होगा कम दर्दनाक और अधिक प्रभावी
विशेषज्ञों के अनुसार, mRNA आधारित कैंसर टीकों के आने से मरीजों को कीमोथेरेपी और रेडिएशन के भीषण दर्द और साइड इफेक्ट्स से राहत मिलेगी।
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हॉस्पिटलाइजेशन में कमी: ये दवाएं अक्सर इंजेक्शन के माध्यम से दी जा सकेंगी, जिससे मरीज को लंबे समय तक अस्पताल में रहने की जरूरत नहीं होगी।
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कैंसर की वापसी पर लगाम: यह तकनीक शरीर की ‘इम्यून मेमोरी’ को विकसित करती है, जिससे भविष्य में उसी प्रकार के कैंसर के लौटने की संभावना न्यूनतम हो जाती है।
2026 के अंत तक आम मरीजों के लिए उपलब्धता
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और विभिन्न देशों की नियामक संस्थाएं (जैसे US-FDA) इन परीक्षणों की बारीकी से निगरानी कर रही हैं। विशेषज्ञों का प्रबल अनुमान है कि दिसंबर 2026 तक पहली टार्गेटेड mRNA कैंसर दवा को व्यावसायिक उपयोग की मंजूरी मिल सकती है। यदि ऐसा होता है, तो यह मानवता के लिए 21वीं सदी की सबसे बड़ी वैज्ञानिक जीत होगी।
डॉक्टरों का मत: “हम अब उस दौर में प्रवेश कर चुके हैं जहाँ कैंसर का इलाज प्रत्येक मरीज के डीएनए के अनुसार अलग-अलग (Tailor-made) होगा। mRNA तकनीक ने वह द्वार खोल दिया है जिसकी कल्पना हम एक दशक पहले तक नहीं कर सकते थे।”
निष्कर्ष: यद्यपि यह तकनीक अभी महंगी हो सकती है, लेकिन बड़े पैमाने पर उत्पादन और सरकारी सब्सिडी के माध्यम से इसे किफायती बनाने की कोशिशें भी शुरू हो चुकी हैं। कैंसर के खिलाफ जंग में अब मनुष्य हारने वाला नहीं है।