
नई दिल्ली। आज 13 जनवरी 2026 को जारी एक वैश्विक स्वास्थ्य रिपोर्ट ने भारत के भविष्य को लेकर एक गंभीर चेतावनी दी है। अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं के एक समूह द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार, डायबिटीज (मधुमेह) अब केवल एक व्यक्तिगत स्वास्थ्य समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा ‘आर्थिक बम’ साबित हो रही है। रिपोर्ट के आंकड़े चौंकाने वाले हैं: वर्ष 2020 से 2050 के बीच, भारत को इस बीमारी के कारण लगभग $11.4 ट्रिलियन (लगभग 950 लाख करोड़ रुपये) का आर्थिक नुकसान झेलना पड़ सकता है।
दुनिया में दूसरे स्थान पर भारत
आर्थिक नुकसान के मामले में भारत अब दुनिया में अमेरिका ($14 ट्रिलियन) के बाद दूसरे स्थान पर आ गया है। यह आंकड़ा चीन और कई यूरोपीय देशों से भी कहीं अधिक है। भारत को ‘दुनिया की डायबिटीज राजधानी’ (Diabetes Capital of the World) कहा जाता है, और यह रिपोर्ट बताती है कि इस उपाधि की कीमत देश को अपने विकास की गति धीमी करके चुकानी पड़ रही है।
नुकसान के दो मुख्य पहलू: जेब पर बोझ और कार्यक्षमता में कमी
विशेषज्ञों ने इस भारी आर्थिक बोझ को दो श्रेणियों में विभाजित किया है:
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प्रत्यक्ष लागत (Direct Costs): इसमें अस्पताल में भर्ती होने का खर्च, इंसुलिन, दवाइयां, और नियमित जांच शामिल हैं। भारत में स्वास्थ्य पर होने वाला अधिकांश खर्च लोग अपनी जेब (Out-of-pocket) से करते हैं, जिससे कई मध्यमवर्गीय परिवार गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं।
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अप्रत्यक्ष लागत (Indirect Costs): रिपोर्ट के अनुसार, असली संकट ‘प्रोडक्टिविटी लॉस’ (कार्यक्षमता में कमी) है। डायबिटीज के कारण होने वाली समय से पहले मृत्यु, विकलांगता (जैसे अंगों का कटना या अंधापन), और बीमारी के कारण काम से अनुपस्थिति (Absenteeism) देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) को सीधे तौर पर प्रभावित कर रही है। भारत की युवा कार्यबल (Working Population) का एक बड़ा हिस्सा इस बीमारी की चपेट में आ रहा है, जिससे अर्थव्यवस्था का इंजन धीमा हो रहा है।
क्यों बढ़ रहा है यह संकट?
अध्ययन में भारत में इस बीमारी के तेजी से फैलने के तीन प्रमुख कारण बताए गए हैं:
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शहरीकरण और जीवनशैली: शारीरिक सक्रियता में कमी और प्रोसेस्ड फूड (जंक फूड) का बढ़ता चलन।
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आनुवंशिक संवेदनशीलता: भारतीयों में आनुवंशिक रूप से पेट के आसपास चर्बी (Visceral Fat) जमा होने की प्रवृत्ति अधिक होती है, जो इंसुलिन रेजिस्टेंस को जन्म देती है।
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देर से निदान (Late Diagnosis): भारत में लगभग 50% लोग इस बात से अनजान हैं कि उन्हें डायबिटीज है, जिससे इलाज जटिल और महंगा हो जाता है।
समाधान की राह: नीतिगत बदलाव की जरूरत
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस ‘आर्थिक महामारी’ को रोकना है, तो सरकार और समाज को मिलकर कदम उठाने होंगे:
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प्रिवेंटिव हेल्थकेयर: प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर शुरुआती जांच की सुविधा मुफ्त और अनिवार्य होनी चाहिए।
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शुगर टैक्स: उच्च चीनी वाले पेय पदार्थों और खाद्य पदार्थों पर ‘सिन टैक्स’ (Sin Tax) लगाने का सुझाव दिया गया है।
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डिजिटल हेल्थ: टेलीमेडिसिन और एआई (AI) आधारित मॉनिटरिंग के जरिए इलाज की लागत को कम किया जा सकता है।
निष्कर्ष
$11.4 ट्रिलियन का यह आंकड़ा एक अलार्म है। भारत यदि अपनी “डेमोग्राफिक डिविडेंड” (युवा शक्ति) का लाभ उठाना चाहता है, तो उसे अपनी आबादी को स्वस्थ रखना होगा। बिना बेहतर स्वास्थ्य नीति के, आर्थिक महाशक्ति बनने का सपना अधूरा रह सकता है।